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आम… हम बेकरार

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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रहते हम बेक़रार,
गरमी का इन्तज़ार
आम होते बेशुमार,
गरमी मनाइए।

आम के है वहाँ बाग,
हमारे हैं बड़े भाग
दादी-बाबा मेरे आप,
वहाँ कभी आइए।

सुबह से जाते बाग,
आम खाते भाग-भाग
तोड़ते अपने हाथ,
सुख नया पाइए।

बाबा पकाते आम,
रखते हैं उसे पाल।
तीसरे दिन निकाल,
स्वाद को बढ़ाइए॥