संदीप ‘सृजन’
उज्जैन (मध्यप्रदेश)
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स्वतंत्रता दिवस विशेष…
राष्ट्रीय ध्वज किसी राष्ट्र की पहचान भर नहीं होता, वह उसकी सामूहिक चेतना, इतिहास और स्वाभिमान का प्रतीक होता है। भारत का तिरंगा भी हमारे लिए केवल ३ रंगों और अशोक चक्र से निर्मित ध्वज नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के संघर्ष, असंख्य बलिदानों और एक बेहतर राष्ट्र के सपने का प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ‘हर घर तिरंगा’ अभियान में उत्साहपूर्वक सहभागी बनने का आह्वान किया है। इस वर्ष इस अभियान का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है कि यह ‘वंदे मातरम्’ के १५० वर्ष पूर्ण होने के अवसर से भी जुड़ा है।
दरअसल, तिरंगा फहराने का अवसर केवल उत्सव का अवसर नहीं है। यह आत्ममंथन का भी समय है कि जिस स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमें गर्व है, उसके प्रति हमारी जिम्मेदारियाँ क्या हैं। तिरंगा हमें अधिकारों के साथ कर्तव्यों की भी याद दिलाता है।
‘हर घर तिरंगा’ अभियान ने राष्ट्रीय ध्वज को सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक समारोहों की सीमाओं से निकालकर आम नागरिक के घर तक पहुँचाया है। आजादी के ‘अमृत महोत्सव’ के दौरान इसकी व्यापक जनभागीदारी ने यह सिद्ध किया कि राष्ट्रभावना भारतीय समाज की गहरी संवेदना है। घरों की छतों पर लहराते तिरंगे, सड़कों पर निकलती तिरंगा यात्राएँ, विद्यालयों में आयोजित कार्यक्रम और युवाओं की सक्रिय भागीदारी—इन सबने राष्ट्रीय पर्वों को एक व्यापक जनउत्सव का रूप दिया, लेकिन किसी अभियान की सफलता केवल उसकी दृश्य भव्यता से नहीं आँकी जानी चाहिए। सवाल यह है कि तिरंगा उतर जाने के बाद उसकी भावना हमारे भीतर कितनी देर तक रहती है ? यदि तिरंगा लगाने के बाद हम सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं, नियमों की अनदेखी करते हैं, भ्रष्टाचार को स्वीकार करते हैं या अपने सामाजिक दायित्वों से मुँह मोड़ लेते हैं, तो राष्ट्रप्रेम अधूरा रह जाता है। तिरंगे का वास्तविक सम्मान हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। विद्यार्थी ईमानदारी से पढ़े, युवा अपने कौशल का विकास करे, किसान मेहनत से उत्पादन बढ़ाए, व्यापारी नैतिकता से व्यवसाय करे, कर्मचारी अपने दायित्व का निर्वहन ईमानदारी से करे और नागरिक कानून का सम्मान करे-यही राष्ट्रध्वज के प्रति सच्ची श्रद्धा है। इसी संदर्भ में ‘हर घर तिरंगा’ को ‘विकसित भारत’ के संकल्प से जोड़ना अत्यंत महत्वपूर्ण है। विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक रूप से शक्तिशाली भारत नहीं है। विकास का वास्तविक अर्थ तब है, जब शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर हो, स्वास्थ्य सुविधाएँ हर व्यक्ति तक पहुँचें, युवाओं को रोजगार और कौशल के अवसर मिलें, किसान सशक्त हों, महिलाएँ सुरक्षित और आत्मनिर्भर हों तथा पर्यावरण संरक्षण विकास की प्राथमिकताओं में शामिल हो।
भारत ने पिछले वर्षों में अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। डिजिटल तकनीक से लेकर अंतरिक्ष अनुसंधान तक और खेलों से लेकर आधारभूत संरचना तक देश ने अपनी क्षमता का परिचय दिया है, लेकिन विकास की यात्रा अभी अधूरी है। गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियाँ हमारे सामने हैं। इनका समाधान केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं हो सकता। लोकतंत्र में राष्ट्र निर्माण सरकार और नागरिक—दोनों की साझी जिम्मेदारी है। इसी लिए, तिरंगा फहराते समय प्रत्येक नागरिक को अपने स्तर पर एक संकल्प भी लेना चाहिए। कोई विद्यार्थी बेहतर शिक्षा का संकल्प ले, कोई युवा रोजगार पाने के साथ दूसरों के लिए रोजगार पैदा करने की दिशा में सोचे, कोई व्यापारी ईमानदार व्यापार का संकल्प ले और कोई नागरिक स्वच्छता तथा पर्यावरण संरक्षण को अपने जीवन का हिस्सा बनाए। ऐसे करोड़ों छोटे संकल्प ही बड़े राष्ट्रीय परिवर्तन की नींव बनते हैं।
इस वर्ष ‘हर घर तिरंगा’ का ‘वंदे मातरम् से जुड़ना भी ऐतिहासिक अवसर है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान राष्ट्रजागरण का शक्तिशाली स्वर बना। यह गीत उस दौर के संघर्ष, त्याग और मातृभूमि के प्रति समर्पण का प्रतीक रहा। आज स्वतंत्र भारत में इसकी स्मृति हमें यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है कि क्या हम अपने देश को वैसा बनाने के लिए पर्याप्त प्रयास कर रहे हैं, जैसा स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वप्न देखा था। ‘वंदे मातरम्’ की भावना केवल अतीत की स्मृति में नहीं, वर्तमान की जिम्मेदारी में भी निहित है। भारतभूमि को ‘सुजलाम् सुफलाम्’ बनाए रखना केवल गीत की पंक्तियों को दोहराने से संभव नहीं होगा। इसके लिए जल संरक्षण, पर्यावरण रक्षा, कृषि की मजबूती और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की आवश्यकता होगी। इस अभियान में युवा वर्ग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के जरिए वे राष्ट्रभावना का संदेश व्यापक स्तर पर पहुँचा सकते हैं। विद्यालय और महाविद्यालय विभिन्न प्रतियोगिताओं और सामूहिक गायन से नई पीढ़ी को इतिहास और राष्ट्रीय मूल्यों से जोड़ सकते हैं, परंतु युवाओं को यह समझना होगा कि देशभक्ति केवल सोशल मीडिया पर तिरंगे की तस्वीर लगाने तक सीमित नहीं है। अपने काम में उत्कृष्टता, कानून का सम्मान, भ्रष्टाचार का विरोध और समाज के कमजोर वर्ग के प्रति संवेदनशीलता भी देशभक्ति है। परिवार और समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। बच्चे तिरंगे का अर्थ केवल किताब से नहीं, परिवार के व्यवहार से सीखते हैं। बुजुर्ग स्वतंत्रता-संग्राम की कहानियाँ सुनाएँ, माता-पिता राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करें और समाज सामूहिक आयोजनों के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को मजबूत करे, तो राष्ट्रभावना पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ सकती है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में निहित एकता है। भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र और संस्कृति की विविधताओं के बावजूद तिरंगा हम सबकी साझा पहचान है। वह हमें याद दिलाता है कि मतभेद हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र एक है। इसलिए तिरंगे को राजनीतिक या सामाजिक विभाजन से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बनाए रखना आवश्यक है, साथ ही तिरंगे के प्रति सम्मान का अर्थ उसके साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करना भी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘हर घर तिरंगा’ केवल कुछ दिनों का अभियान बनकर न रह जाए। तिरंगा हमारे घरों पर कुछ समय के लिए लहराए और फिर उतर जाए, लेकिन उसके आदर्श हमारे जीवन में स्थायी रूप से बने रहें। राष्ट्रप्रेम यदि कर्म में दिखाई देता है तो वही सबसे सार्थक देशभक्ति है।
तिरंगा हमें अतीत के बलिदानों से जोड़ता है, ‘वंदे मातरम्’ हमारी राष्ट्रीय चेतना को स्वर देता है और ‘विकसित भारत’ का संकल्प हमें भविष्य की ओर ले जाता है। इसलिए इस बार तिरंगा फहराएँ तो उसके साथ एक प्रश्न स्वयं से भी पूछें—मैं भारत के लिए क्या कर सकता हूँ ? इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर ही ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की वास्तविक सफलता बनेगा। जब करोड़ों भारतीय अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी, परिश्रम, अनुशासन और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ेंगे, तभी तिरंगा केवल घरों की छतों पर नहीं, बल्कि भारत की उपलब्धियों के आकाश में भी और ऊँचा लहराएगा। तिरंगा हर घर तक पहुँचे, वंदे मातरम् हर हृदय में गूँजे और राष्ट्र निर्माण की भावना हर नागरिक के कर्म में दिखाई दे—यही इस अभियान का वास्तविक उद्देश्य और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।