डॉ. शैलेश शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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हिन्दी दिवस (१४ सितम्बर) विशेष…
भाषा सिर्फ शब्दों का समूह नहीं होती, भाषा एक सभ्यता की आत्मा होती है और जब हम हिंदी की बात करते हैं तो हम सिर्फ एक भाषा की बात नहीं करते, जीवंत सभ्यता की बात करते हैं जो आज दुनिया के हर कोने में साँस ले रही है। अंग्रेजों को अपने साम्राज्य पर गर्व था कि उनके राज में सूर्य कभी अस्त नहीं होता, क्योंकि दुनिया के किसी न किसी हिस्से में उनका झंडा लहराता रहता था। आज वही गौरव हिंदी को प्राप्त है और वह भी बिना किसी तलवार और बिना किसी साम्राज्य के, सिर्फ प्रेम, फिल्म, संगीत, योग और अब इंटरनेट और ए.आई. के दम पर। हिंदी का सूर्य कभी अस्त नहीं होता, क्योंकि जब भारत में रात के बारह बजते हैं, तो लंदन में शाम होती है और वहाँ कोई माँ अपने बच्चे को हिंदी में सुला रही होती है, जब लंदन में रात होती है तो टोरंटो में दोपहर होती है और वहाँ टैक्सी में हिंदी गाना बज रहा होता है और जब टोरंटो में रात होती है तो फिजी में सुबह होती है और वहाँ के विद्यालय में बच्चे हाथ जोड़कर गा रहे होते हैं -“इतनी शक्ति हमें देना दाता।” यह चक्र चौबीस घंटे चलता है और कभी रुकता नहीं।
कुछ लोग जो सिर्फ किताबी आँकड़ों पर भरोसा करते हैं, वे कहते हैं कि हिंदी बोलने वाले ६०-७० करोड़ हैं, लेकिन यह आधी-अधूरी गिनती है जो सिर्फ मातृभाषा के कॉलम को देखती है। अगर हम भाषा को उसकी व्यावहारिक ताकत से देखें, यानी कौन बोलता है, कौन समझता है, कौन काम चलाता है, कौन गाना सुनता है, कौन फिल्म देखता है, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। आइए इस प्रैक्टिकल गणना को जमीन पर उतर कर देखते हैं, बिना किसी कल्पना के, सिर्फ आँकड़ों और राज्यों की आबादी के आधार पर। सबसे पहले भारत के उन १० राज्यों को लेते हैं जहाँ हिंदी मातृभाषा है, घर की भाषा है। उत्तर प्रदेश की आबादी आज लगभग २५ करोड़ है, बिहार की १४ करोड़, मध्य प्रदेश की ९ करोड़, राजस्थान की ८.५ करोड़, हरियाणा की ३.२ करोड़, झारखंड की 4 करोड़, छत्तीसगढ़ की ३.२ करोड़, दिल्ली की २.५ करोड़, उत्तराखंड की १.२ करोड़ और हिमाचल प्रदेश की ८० लाख। इन सबको जोड़ दीजिए तो संख्या ७० करोड़ को पार कर जाती है। ये ७० करोड़ लोग वो हैं, जिनके लिए हिंदी सीखने की भाषा नहीं, बल्कि रोज जीने की भाषा है। वे पैदा होते ही हिंदी सुनते हैं और हिंदी में ही सोचते हैं। आईएएमएआई -कंतार की २०२५ की रिपोर्ट और ट्राई की मार्च २०२६ की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि भारत में १०९.२ करोड़ इंटरनेट सब्सक्राइबर हैं, जिनमें ५७ प्रतिशत यानी ५४.८ करोड़ ग्रामीण भारत से हैं और ये ग्रामीण उपयोगकर्ता इन्हीं १० राज्यों से सबसे ज्यादा आते हैं जो इंटरनेट पर हिंदी में ही तलाश (सर्च) करते हैं, हिंदी में ही वीडियो देखते हैं।
अब दूसरे हिस्से को देखिए जो अक्सर गिनती से छूट जाता है, यानी भारत में ही ४० करोड़ लोग जो हिंदी को दूसरी भाषा के रूप में समझते और बोलते हैं। महाराष्ट्र और गुजरात को लीजिए, जहाँ मराठी देवनागरी में ही लिखी जाती है और गुजराती की लिपि भी देवनागरी से मिलती-जुलती है, यहाँ का व्यापारी, मजदूर और छात्र रोज हिंदी में काम चलाता है। सिक्किम में नेपाली, जम्मू में डोगरी, असम में बोडो, बिहार में मैथिली जैसी भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं और ये हिंदी की सगी बहनें हैं, इसलिए इन क्षेत्रों के लोग बिना पढ़ाए हिंदी समझ लेते हैं। दक्षिण भारत में केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में स्कूलों में हिंदी तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है और वहाँ रेलवे स्टेशन, बाजार, सिनेमा हॉल और अब तो हर मोबाइल में मौजूद ओटीटी, यूट्यूब और सोशल मीडिया रील्स एवं शॉर्ट्स ने हिंदी को घर-घर पहुँचा दिया है, आज करीब ६० करोड़ लोग शॉर्ट वीडियो देखते हैं और उनमें से अधिकतर सामग्री (कंटेंट) हिंदी और उससे मिलती-जुलती भाषाओं में है। हैदराबाद में तो हिंदी आम बोलचाल की भाषा बन चुकी है। इस तरह महाराष्ट्र, गुजरात, सिक्किम, डोगरी-बोडो-मैथिली क्षेत्रों और दक्षिण के ५ राज्यों में मिलाकर ४० करोड़ लोग ऐसे हैं जो हिंदी को अपनी रोजमर्रा की जरूरत के लिए इस्तेमाल करते हैं। वे हिंदी फिल्मों के डायलॉग जानते हैं, वे हिंदी गानों पर नाचते हैं और वे इंटरनेट पर हिंदी में टिप्पणी (कमेंट) करते हैं, तो भारत के अंदर ही कुल संख्या हो जाती है ७० करोड़ जमा ४० करोड़, यानी ११० करोड़। इसका अर्थ है कि १४५ करोड़ के भारत में ११० करोड़ लोग, यानी ७५ प्रतिशत से ज्यादा आबादी, हिंदी से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।
अब भारत की सीमा से बाहर निकल कर पूरे उपमहाद्वीप को देखिए। भाषा विज्ञान का एक सच्चा नियम है कि हिंदी और उर्दू २ अलग भाषाएँ नहीं हैं, वे एक ही बोली के २ लिखने के तरीके हैं। आम बोलचाल में पानी, रोटी, घर, दिल, प्यार, दोस्त, इज्जत जैसे शब्द हिंदी में भी वही हैं और उर्दू में भी वही हैं। पाकिस्तान की २४ करोड़ आबादी उर्दू बोलती है जो बोलने में ९० प्रतिशत हिंदी ही है। नेपाल की ३ करोड़ आबादी नेपाली बोलती है जो देवनागरी में लिखी जाती है और हर नेपाली हिंदी फिल्म देखकर हिंदी समझता है और बांग्लादेश की १७ करोड़ आबादी में से ८ करोड़ युवा वर्ग सीमा के संपर्क और हिंदी फिल्मों-गानों के कारण हिंदी-उर्दू अच्छी तरह समझता है। इन तीनों देशों को मिलाकर ३५ करोड़ लोग ऐसे हैं, जो बिना हिंदी की किताब पढ़े ही हिंदी समझ लेते हैं। इस तरह उपमहाद्वीप में कुल संख्या हो जाती है ११० करोड़ जमा ३५ करोड़, यानी १४५ करोड़। यह संख्या किसी भी सरकारी जनगणना से बड़ी है, क्योंकि यह प्रयोग के आधार पर गिनी गई संख्या है, कागज के आधार पर नहीं।
अब दुनिया के नक्शे को और बड़ा करिए। आज दुनिया का कोई देश ऐसा नहीं है, जहाँ भारतीय, पाकिस्तानी, नेपाली और बांग्लादेशी न रहते हों। खाड़ी देशों दुबई, सऊदी अरब, कतर, ओमान, कुवैत में १ करोड़ से ज्यादा भारतीय -पाकिस्तानी मजदूर और व्यापारी रहते हैं एवं वहाँ केरल का नर्स और यूपी का मिस्त्री आपस में हिंदी में ही बात करता है, क्योंकि हिंदी ही वहाँ की संपर्क भाषा बन गई है। अमेरिका में ५० लाख, कनाडा में २५ लाख, ब्रिटेन में २० लाख, ऑस्ट्रेलिया में १० लाख भारतीय बसे हैं, फिजी में हिंदी सरकारी भाषा है, मॉरीशस की संसद में हिंदी बोली जाती है, सूरीनाम, त्रिनिदाद और गुयाना में आज भी भोजपुरी और हिंदी गीत गाए जाते हैं। इन लोगों की दूसरी और तीसरी पीढ़ी भले ही विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ती हो, लेकिन घर में दादी से वीडियो कॉल पर वह हिंदी में ही कहती है – “दादी, पैर छू रही हूँ।” ऐसे ८ करोड़ लोग दुनियाभर में फैले हैं, जो रोज हिंदी से जुड़े हैं और हिंदी को जिंदा रखे हैं।
और अंत में वह सबसे नया परिवार जो पिछले २ साल में सबसे तेजी से बढ़ा है, यानी ५ करोड़ विदेशी प्रशंसक जो न भारतीय हैं, न पाकिस्तानी, फिर भी हिंदी से जुड़े हैं। रूस, जर्मनी, तुर्की, मिस्र, नाइजीरिया में लोग बिना सब-टाइटल के हिंदी फिल्म देखते हैं, यू-ट्यूब पर हिंदी गानों के अरबों व्यूज इसी बात के गवाह हैं। दुनिया में ३० करोड़ से ज्यादा लोग योग करते हैं और योग के साथ वे नमस्ते, शांति, ध्यान, गुरु, कर्म जैसे हिंदी-संस्कृत शब्द सीखते हैं। सबसे बड़ी क्रांति तो ए.आई. ने की है। डिजिटल २०२६ की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में ए.आई. उपयोगकर्ता १ बिलियन से ज्यादा हो गए हैं और चैट जीपीटी ने मई २०२६ में १ बिलियन मासिक उपयोगकर्ता का आँकड़ा पार किया है, जिसमें २० करोड़ यूजर अकेले भारत से हैं जो ए.आई. से हिंदी में सवाल पूछ रहे हैं, हिंदी में कहानी लिखवा रहे हैं और हिंदी में ई-मेल बनवा रहे हैं। अब जापान का आदमी भी ए.आई. की मदद से हिंदी सीख रहा है क्योंकि यह तुरंत अनुवाद कर देता है। ऐसे ५ करोड़ लोग हैं जो हिंदी फिल्म, योग और ए.आई. के कारण हिंदी परिवार के नए सदस्य बन गए हैं।
भारत में मातृभाषा के रूप में ७० करोड़, भारत में दूसरी भाषा के रूप में ४० करोड़, भारत में कुल ११० करोड़, पाकिस्तान-नेपाल-बांग्लादेश में ३६ करोड़, उपमहाद्वीप में कुल १४५ करोड़, दुनियाभर में बसे भारतीय-उपमहाद्वीपीय लोग ८ करोड़ और दुनिया भर के प्रशंसक ५ करोड़, कुल मिलाकर १५८ करोड़ यानी लगभग १५० करोड़ से ज्यादा। यह गिनती किसी को खुश करने के लिए नहीं है, यह वही तरीका है जिससे अंग्रेजी को १५० करोड़ जनता की भाषा माना जाता है, जबकि अंग्रेजी को मातृभाषा के रूप में बोलने वाले सिर्फ ४० करोड़ हैं, बाकी ११० करोड़ लोग दूसरी भाषा के रूप में गिने जाते हैं। अगर वही न्याय हिंदी के साथ किया जाए तो हिंदी भी १५० करोड़ से ज्यादा लोगों की बोली और समझी जाने वाली भाषा है। कई मायनों में तो यह अंग्रेजी से भी बड़ी है, क्योंकि अंग्रेजी समझने के लिए विद्यालय जाना पड़ता है, लेकिन हिंदी-उर्दू समझने के लिए सिर्फ एक फिल्म देखनी पड़ती है।
इसलिए यह कहना कि हिंदी दुनिया की सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है, कोई भावुक नारा नहीं है, यह आँकड़ों, भूगोल और तकनीकी तीनों पर खरा उतरने वाला सच है। १०९ करोड़ इंटरनेट सब्सक्राइबर, ५८.८ करोड़ शॉर्ट वीडियो उपयोगकर्ता और २० करोड़ ए.आई. यूजर इस बात के जीवित सबूत हैं कि हिंदी अब किताबों से निकल कर मोबाइल की स्क्रीन पर राज कर रही है। जब १५० करोड़ लोग अपनी ही भाषा में अपनी कहानी कहेंगे, जब लोकल लोग वोकल होंगे, तब दुनिया को एल्गोरिदम की बनाई हुई कहानी नहीं, इंसान की असली कहानी सुनाई देगी और तभी यह सिद्ध होगा कि हिंदी सिर्फ भारत की ही नहीं, दुनिया की आत्मा की भाषा है, जिसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता।