नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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ये पापी पेट न होता,
जीवन में कभी न रोना होता
ये ऐसा कुआँ है, जितना भी भरो दिन में,
सुबह फिर खाली हो जाता।
इसे भरने के लिए,
दिन-भर मेहनत करना होती
फिर भी यह खाली ही रहता,
सारा समय पेट भरने में ही जाता।
कैसे करूँ जीवन में उत्थान अपना,
जब सारा समय पेट भरने में जाता है
बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसे नहीं होते,
बेबसी में मजदूरी करती नारी के दिल से
दर्द भरी आह निकलती है।
काश! ये पापी पेट न होता,
तो इतना रोना न पड़ता
ज़िंदगीभर मेहनत करके भी,
जब पेट नहीं भर पाता
तब मन बहुत दुखी हो जाता।
फिर भी करते हैं काम सुबह-शाम,
पर दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है
सब बच्चे पढ़ते हैं, उन्हें देखकर,
अपने बच्चे भी सोचते हैं
कब और कैसे पढ़ेंगे हम ?
यह सोच मन को बहुत रुलाती है।
जो बच्चे पढ़ने लायक होते हैं,
वे गाय-भैंस चराते हैं
पढ़ने की उम्र में भी वे,
रोजी-रोटी के लिए काम करते हैं
पेट की मजबूरी के कारण,
उनके सपने अधूरे रह जाते हैं।
जो ईमानदार है, उसे भी,
यह पापी पेट बेईमान बना देता है।
रोटी की मजबूरी में इंसान,
कभी अपने सिद्धांत भूल जाता है॥