कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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बाबा की मैं लाड़ो थी,
छोड़ दिए सब बाग-बगीचे
सुन लो मेरे साजन प्रीत,
बचपन की सखियाँ छोड़ी।
छोड़ दिया मन-मीत,
सुन लो मेरे साजन प्रीत
बन गई तेरी,
छोड़ दिए बचपन के मीत।
चंचल तितली थी मैं हरदम,
कहाँ पग रहता स्थिर
बाबा का आँगन छोड़ चली,
सजा लिया घर साजन का।
दु:ख के आँसू पीकर,
सुख की मुस्कान दिखाई
विदा होकर जब से आई,
आँगन का हर कोना सजाया।
सब खुश रहें यह सोच,
आँसू पीकर दिन भर मुस्कायी
चंचल गौरैया जैसी,
कभी यहाँ, कभी वहाँ खेला करती।
बाबा मैं बचपन में,
भाई-बहन की आँखों की पुतली बनी रहती,
बाग-बगीचे सूने पड़े,
द्वारे पर भाई खोया बैठा।
आँखों के आँसू सूख गए,
मेरे नैना सुख की राह देखें
दीपावली में जिस घर में,
स्वप्न घरौंदा बनाती थी।
बहुत मुश्किल है बाबा,
अपना वो छोटा-सा घरौंदा, भूल पाना
नन्ही गौरैया बन जिस आँगन की,
खुशियाँ बन जाती थी।
रहती अब हरदम समझदार,
फिर भी बाबा बेवकूफ ही समझा जाता मुझको
कैसे कह दूं बाबा दर्द सारा अपना,
फट जाएगा करेजा तेरा।
इसलिए चुपचाप दु:ख को पीती रह गई,
बाबा तेरी आँख से आँसू ना गिरे
इसलिए अपनी सिसकियां दबा कर रख लेती,
मेरी सिसकियां तुम सुन ना पाओ।
होंठ अपने सिल लेती हूँ, अब खुश हो तुम बाबा,
यह सोच कर कि है मेरी लाडो बहुत खुश।
इसलिए आँसू पीकर अब मुस्कुरा रही हूँ,
अपना आँगन सजा रही हूँ बाबा॥