इंदौर (मप्र)।
गुरु एक अक्षर का ज्ञान भी शिष्य को दे दें तो इस पृथ्वी पर ऐसा कोई द्रव्य या वस्तु नहीं, जिसे गुरु को समर्पित कर शिष्य ऋण मुक्त हो जाएं। हमारी भारतीय संस्कृति में वेद व्यास से गुरु परंपरा चली आ रही है।
वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी विनय उपाध्याय ने यह बात गुरु पूर्णिमा पर वामा साहित्य मंच की मासिक गोष्ठी में कही। प्रचार प्रमुख सपना साहू ‘स्वप्निल’ ने बताया कि कार्यक्रम का आरंभ रचना चौपड़ा द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। संस्था अध्यक्ष ज्योति जैन ने सभी लोगों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए स्वागत उद्बोधन में स्वयं के गुरु श्रीराम ताम्रकार को याद करते हुए कहा कि उन्होंने मुझे सिखाया कि लिखते हो, तो छपना भी सीखो। गुरु का सानिध्य ही मनुष्य के पूरे जीवन को रूपांतरित कर देता है।
कार्यक्रम में मृदुला गर्ग, कविता अर्गल, नीरजा जैन, डॉ. सुशीला सालगिया व इन्दु पाराशर आदि सदस्यों ने अपने गुरुओं को स्मरण करते हुए प्रेरणास्पद संस्मरण साझा किए।
कार्यक्रम की संयोजक डॉ. रागिनी सिंह एवं रश्मि चौधरी रहीं। संस्था की सचिव स्मृति आदित्य ने आभार व्यक्त किया।