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जब तक हिंदी को अस्मिता का प्रश्न नहीं बनाएंगे, प्रगति संभव नहीं-डॉ. पांडेय

भोपाल (मप्र)।

हिंदी राजभाषा तो बन गई, किंतु राष्ट्रभाषा आज तक नहीं बन पाई। रोजगार के लिए आज भी हम अंग्रेजी का मुँह देखते हैं। आज हिंदी भाषा के साथ देवनागरी लिपि पर भी संकट है। जब तक हम हिंदी को अपनी अस्मिता का प्रश्न नहीं बनाएंगे, हिंदी की प्रगति संभव नहीं।
यह उदगार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राकेश पांडेय (संपादक ‘प्रवासी संसार’, नई दिल्ली) ने लघुकथा शोध केंद्र समिति (भोपाल) द्वारा ‘निज भाषा उन्नति अहै’ शीर्षक के अंतर्गत आयोजित राजभाषा पखवाड़े के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि वक्ता के रूप में व्यक्त किए। आभासी माध्यम के इस आयोजन में केंद्र की निदेशक कांता रॉय ने कार्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. पूर्णिमा बर्मन (यूएई) ने कहा कि हिंदी में मनोरंजन मीडिया पत्रकारिता, अनुवाद और संग्रहालय आदि में रोजगार की विपुल संभावनाएं हैं। हम हिंदी के अध्ययन द्वारा पद, धन एवं प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं। अतिथि वक्ता प्रमोद भार्गव (वरिष्ठ पत्रकार, ग्वालियर) ने कहा कि हिंदी के विकास मार्ग में असल अवरुद्ध हिंदी भाषी वे समृद्ध लोग हैं, जो आर्थिक रूप से सम्पन्न होते ही अंग्रेजी के घोर समर्थक हो जाते हैं। हमारे देश की शिक्षा, संस्कृति और भाषा को इन लोगों ने बड़ी क्षति पहुंचाई है।
संयोजक डॉ. ममता माली (मुम्बई) और चित्रा राघव राणा (कनाडा) ने कार्यक्रम का सफल संचालन किया। केंद्र के सचिव घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ ने सभी का आभार प्रकट किया।