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दुर्गा माँ जैसी ही मेरी माँ

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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मेरी माँ ही दुर्गा माँ है,
मेरी माँ ही शक्ति माँ है
दुर्गा माँ जैसी ही मेरी माँ है,
मेरी माँ के दो हाथ होते हैं
पर दस हाथ बनाकर सारा काम करती।

सुबह-सुबह जब उठती,
चारों ओर से माँ-माँ की पुकार होती
बच्चे बोलते, मेरी वह किताब मिल नहीं रही
तुरंत खोजकर दे देती, दूसरा बोलता,-माँ, टिफिन मेरा।
तुरंत टिफिन का डब्बा पकड़ा देती,
तीसरा बोलता, -चाय मेरी।
तुरंत चाय बनाकर देती।

पति कहते, -मेरी फाइल नहीं मिल रही,
फाइल खोजकर उन्हें देती
इस तरह दो हाथों को दस बनाती,
दुर्गा माँ जैसी ही।

माँ ऐसी होती है, जो हर दु:ख-दर्द हर लेती,
कोई गलत काम करने पर
वह चंडी बनकर खूब डाँटती,
जब तक उसका गुस्सा शांत नहीं होता
सही राह पर जब तक हम सभी नहीं चलते।

बिना कहे भी सारी जरूरतें पूरी करती,
मन में खुशी भर देती, माँ दुर्गा जैसी
कभी प्रेम से समझाती, कभी पढ़ाती।

मानो सरस्वती बनकर ज्ञान देती,
विद्या दान करती मुझ जैसे नासमझ को
मेरी माँ भूखी रहकर भी,
मुझे मेरी पसंद का खिलाती।

मैं क्या मंदिर जाऊँ, जब माँ मेरी,
दुर्गा बनकर घर पर बैठी है।
उन्हीं को देखकर मन हर्षाता है।
मेरी माँ ही मेरी दुर्गा माँ है॥