कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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भीतर का रावण (विजयादशमी विशेष)….
कोशिश तो बहुत की,
मन पर चोट बार-बार दी
निकालना था उसको,
निकला तो अपना ही दर्द
क्योंकि वह था तो मेरे ही अंदर।
अच्छा कहूँ या बुरा,
हम तो खुद ही बुरे बन बैठे
अंदर ही था वह शैतान,
रावण के रूप में बैठा था।
जल उठता है रावण मन के भीतर,
जब भी होती है मेरे ही सामने
किसी और की तारीफ़।
मन ही मन मैंने ठाना,
चलना है अपने ही अंदर
बैठे काम, क्रोध और मोह को,
जलन, ईर्ष्या, सबको मार देना है।
अपने ही अंदर के खतरनाक,
दुश्मन रूपी रावण को खत्म करना है
जो बैठा-बैठा खा रहा है मुझे,
जिस्म को खोखला कर रहा है
और हम बैठे हैं मानसिक रोगी बनकर।
मन के भीतर के रावण,
ने खा लिया मेरे मन को
आओ न राम।
मेरे मन के मंदिर में,
सब भूलकर हम भी राम-भजन में लगें॥