पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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सुमित्रा की आँखों से अश्रुधारा निरंतर बह रही थी, आज वह बेसहारा हो गई थी। नीरा आंटी आज अचानक रात में सोईं तो सोती रह गई। उसके सिर के ऊपर से छत छिन गई थी। उसकी पालनहार आज दुनिया से विदा हो गईं थीं। वह उसे बेटी की तरह मानती थीं, कई बार उसने खुद उन्हें अपने बेटों से कहते हुए सुना था कि तुम दोनों तो मेरे बेटे हो ही लेकिन मेरी एक बेटी भी है। जो रात-दिन मेरी सेवा में लगी रहती है। आज अचानक ही अपनी आँखें मूँद कर चिरनिद्रा में लीन हो गईं।
वह बिलख रही थी। उसके आँसू रुक नहीं रहे थे। उनका पार्थिव शरीर २ दिन तक मोर्चुरी में रखा रहा था, क्योंकि उनके दोनों बेटे अमेरिका में थे। वहाँ से फ्लाइट लेकर उन लोगों को आने में समय तो लगना स्वाभाविक ही था।
वह घर में बिल्कुल अकेली थी। जब नीरा आंटी ने सुबह आँखें ही नहीं खोलीं थीं, तो उनको बेसुध देख कर ऐसा लगा कि जैसे सब कुछ थम-सा गया है। उसने पड़ोस में रहने वाले रमेश अंकल को फोन किया तो वह तुरंत भागते हुए आ गए थे। फिर तो उसे जल्द ही समझ में आ गया कि सब कुछ समाप्त हो चुका है।
२० साल की सुमित्रा की अम्मा नीरा आंटी के यहाँ बरसों से बर्तन और झाडू का काम किया करतीं थीं। वह स्कूल में पढती थी। अम्मा चाहतीं थीं कि वह पढ़-लिख कर मास्टरनी बन जाए। उसने बी.ए. में एडमिशन ही लिया था कि तभी आंटी को टायफाईड हो गया था, तो उन्हें दिनभर की देखभाल के लिए किसी की जरूरत थी, इसलिए अम्मा ने उसे ही चार-छः दिन के लिए उनके घर पर रख दिया था। बस आंटी को अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वह इतनी अच्छी लगी, कि उन्होंने अम्मा से कह कर उसे अपने घर में ही रख लिया था। और साथ में उसकी पढ़ाई का भी पूरा जिम्मा भी ले लिया। वह उसे बहुत प्यार से अपनी बेटी की तरह ही रखतीं थीं।
एक साल भी नहीं बीता था, उसकी अम्मा ‘कोरोना’ की महामारी में इस दुनिया से उसको आंटी के हवाले करके सदा के लिए चैन की नींद सो गईं थीं। अब तो उसके लिए जो कुछ भी थीं, नीरा आंटी ही थीं।
दोनों भइया और भाभी आईं तो वह फफक कर रो पड़ीं थीं। अर्जुन भइया रहते तो अमेरिका में थे, परंतु अपनी माँ की अंतिम क्रिया पूरे विधि-विधान से करते देख कर उसे आश्चर्य भी हुआ था। जब उस दिन बड़े भइया अपने बाल कटा कर धोती पहन कर घर आए थे।
आज हवन और उसके बाद ब्राह्मण भोज में तो भइया लोगों ने कोई कसर ही नहीं छोड़ी थी। वह तो पंडितों को देने वाला सामान ही देखती रह गई थी। वह पूरे दिन भाग-दौड़ करती रही थी। रह-रह कर उसकी आँखें बरस पड़तीं थीं।
आज शकुन बुआ आईं तो पहले तो जोर-जोर से रोने का नाटक करतीं रहीं, फिर उसकी ओर घूर-घूरकर आयुष भइया से फुसफुसा कर कह रहीं थीं, “नीरा तो बहुत सीधी थी, य़े लड़की बहुत चालाक लगती है। जाते समय इसकी तलाशी ले लेना इसने अकेले में जाने क्या-क्या चुरा लिया होगा।”
उस समय वह किचन में सफाई कर रही थी, यह सुनकर वह फफक कर रो पड़ी थी। तभी सोमा भाभी इधर आ गईं और उसको रोते देख भाभी ने प्यार से अपने गले से लगा लिया था।
“सुमित्रा तुम बुआ जी की बात का बुरा न मानो। हम लोग उनके सामने इसलिए चुप हैं, क्योंकि वह बड़ी हैं। इनसे कुछ कहने का कोई फायदा नहीं है। वह तो शाम को चली जाएंगी, फिर हम लोग बैठ कर सोचेंगें, कि अब आगे क्या करना है।”
सुमित्रा की आँखों से नींद उड़ी हुई थी। अम्मा ने तो उसकी शादी के लिए रुपए भी आंटी के पास जमाकर रखे थे। अब भइया-भाभी को वह ये बातें वह किस मुँह से बताए ? फिर वह अकेली लड़की अपना सिर छिपाने के लिए कहाँ जाएगी। आखिर में उसने निश्चय कर लिया था, कि वह अपना सामान समेट कर पहले जहाँ अम्मा रहतीं थी, वहाँ जाकर कुछ दिन तक श्यामा मौसी के घऱ पर रह लेगी। फिर सोचेगी, कुछ ट्यूशन और बढ़ा लेगी। वह सुबह का इंतजार करने लगी। सब मेहमान जा चुके थे, अब घर में सन्नाटा छाया हुआ था।
सुबह जब वह उठ कर कमरे से बाहर आने के लिए सोच ही रही थी, कि सोमा भाभी उसके कमरे में आईं।
“सुमित्रा, आज चाय नहीं पिलाओगी क्या ? तुम अपने लिए भी बना लेना।” भाभी ने टोस्ट पर मक्खन लगाया और बोलीं, “चलो सब लोग साथ में बैठकर चाय पिएंगें।“
“जी भाभी, बस बनाती हूँ।”
“सुमित्रा, आज अपने भइया को अपने हाथ की कढ़ी जरूर से खिला देना, कल कह रहे थे कि बस एक दिन ही तो बचा है, आज कढ़ी चावल बनवाना। सुमित्रा बिल्कुल अम्मा के स्वाद का खाना बनाती है।“
“सुमित्रा तुम्हारी अम्मा तो अब रही नहीं, तुम अब कहाँ जाओगी ?”
“ अम्मा ने बताया था कि तुम यहाँ पर बच्चों को पढ़ाती भी हो।”
वह खुश होकर बोली, कि आंटी ने कहा था “सुमित्रा अपने पैरों पर खड़ी होने की कोशिश करो।”
आंटी को याद कर उसकी आँखें भीग उठीं, “भाभी आप लोग फिक्र न करें, उस दिन श्यामा मौसी कह कर गईं हैं, बिटिया अब तुम मेरे पास रह लेना।”
“कौन…? वह श्यामा जो उस दिन आई थी, वह तो कह रही थी कि सुमित्रा के साथ अपने भाई की रिश्ता करवा देंगें।“
“नहीं भाभी, उनका भाई ४० साल का आवारा और बदमाश आदमी है।“
“आपने अच्छा किया, कि मुझे बता दिया अब मैं उनके पास रहने के लिए कभी नहीं जाऊंगीं।“
सब लोग एकसाथ बैठ कर चाय पीते हैं और कल निकलने की तैयारी के बारे में बातें करते हैं, तभी अर्जुन भइया बोले ”सुमित्रा तुम मम्मी के पास कितने सालों से रह रही हो ?”
“जी भइया ३ साल हो चुके हैं। इस साल मेरा एम.ए. का आखिरी साल है। आंटी जी ने कई स्कूलों में मेरा फॉर्म भरवाया है। वह कह रहीं थीं कि तुम्हारा बी. एड . हो जाएगा तो तुम्हें अच्छी नौकरी मिल जाएगी और तुम्हारी अम्मा की आत्मा को शांति मिल जाएगी ।.”
“बी.एड. की तो फीस बहुत हुआ करती है।”
“अब एम.ए. की तो परीक्षा होने वाली है। फिर भइया किसी छोटे स्कूल में या कहीं मॉल में कुछ दिनों तक नौकरी कर लूँगीं, थोड़ा पैसा इकट्ठा हो जाएगा, तब बी.एड. कर लूँगीं।”
उसने दोपहर में लंच बनाया, सब साथ में बैठे तो बड़े भइया ने कहा, “रोटी सेंक लो, आज सब लोग साथ में खाना खाएंगें।”
सोमा भाभी साथ में काम करवा रहीं थीं। सुमित्रा डायनिंग टेबिल पर बैठी तो एक बार फिर से आंटी की याद करके उसकी आँखें भर आईं थीं।
“सुमित्रा कल हम लोगों की फ्लाइट है, तुम जैसे पहले रहतीं थीं वैसे रहती रहोगी।”
“सच कहूँ तो यह घर तुम्हारे लिए नववर्ष का उपहार है। अब ये घर तुम्हारा है।”
“हाँ, यदि इंडिया हम लोग आए तो तुमसे मिलने जरूर आएंगें। ये तुम्हारी पासबुक है, जिसमें मम्मी ने तुम्हारी बी.एड. की फीस जमा कर रखी है।“
सुमित्रा विस्मित नेत्रों से उन लोगों को देख रही थी, कि क्या यह सच में यह नववर्ष उसके लिए इतनी सारी खुशियाँ लेकर आया है।”
वह सोमा भाभी के गले लग कर सिसक पड़ी।