डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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सुबह की धुंध में लिपटा छोटा-सा कस्बा था। चौक पर तिरंगा फहराने की तैयारी हो रही थी। बच्चे लाइन में खड़े अभ्यास कर रहे थे। उसी भीड़ में खड़ा था १२ वर्ष का रवि, जिसकी आँखों में आज कुछ अलग चमक थी। उसके पास विद्यालय की पुरानी नीली वर्दी थी, किन्तु सीने पर लगने वाला बैज नहीं था।
पिता रेल पटरी पर काम करते हुए दुर्घटना में चले गए थे। माँ सिलाई कर किसी तरह घर चलाती थीं। रवि को परेड में शामिल होना था, पर उसके पास गणतंत्र दिवस का बैज खरीदने के पैसे नहीं थे। उसने अपनी जेब में रखा नीला रूमाल निकाला और उससे ही सीने पर तिरंगे की आकृति बना ली।
मुख्य अतिथि मंच पर आए। ध्वजारोहण हुआ। राष्ट्रगान के समय रवि का गला भर आया। उसकी दृष्टि अचानक मंच पर बैठे एक बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानी पर पड़ी, जिनकी आँखें उसी नीले रूमाल पर टिक गयी थीं।कार्यक्रम के बाद वे रवि के पास आए।
“बेटा, यह बैज कहाँ से लिया ?”
रवि ने झुकी आँखों से कहा, “खरीद नहीं सका दादाजी…, इसलिए अपने रूमाल से बना लिया।”
वृद्ध सेनानी की आँखें नम हो गयीं। उन्होंने अपना काँपता हाथ रवि के सिर पर रखा- “बेटा, हमने लाठियाँ खाईं थीं, ताकि आज के बच्चे पैसे के बैज नहीं, दिल के तिरंगे लगाएँ। आज तुमने मुझे असली गणतंत्र दिखा दिया।”
उन्होंने जेब से छोटी-सी संविधान पुस्तिका निकाली और रवि को देते हुए कहा, “यह देश का असली गहना है। पढ़ना, समझना और जीना-यही गणतंत्र है।”
रवि ने वह पुस्तिका सीने से लगा ली। नीला रूमाल अब उसके लिए सिर्फ कपड़ा नहीं रहा; वह उसके कर्तव्य की पहचान बन गया था। चौक पर खड़े हर बच्चे ने पहली बार जाना कि गणतंत्र दिवस झंडा फहराने का उत्सव भर नहीं, बल्कि संविधान को अपने जीवन में उतारने का संकल्प है।
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥