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बंगलौर का सफ़र

सीमा जैन ‘निसर्ग’
खड़गपुर (प.बंगाल)
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“ट्रेन६ घंटे री-शेड्यूल हो गई”… का आईआरएसएमएस मैसेज देखकर थोड़ी कोफ्त हुई। ओह, अब बंगलौर सुबह छह बजे पहुंचेंगे। चलो ठीक है, मैंने खुद को दिलासा दिया,” वैसे भी बेटी का इंटरव्यू ११ बजे के बाद ही होगा”, पर छोटे शहर से बंगलौर जाने वाले युवा भी अन्य पॉइंट्स पर दुखी हो सकते होंगे मैंने सोचा, या थक-हारकर इन सरकारी असुविधाओं के आदि हो गए हैं।
ट्रेन में खाने के लिए बनाया खाना जल्दी-जल्दी फ्रिज में ठूंस दिया। अब शाम से, ट्रेन के प्रथम स्टेशन से छुटने का इंतजार कर मोबाइल को चैन नहीं लेने दे रहे थे मैं और मेरी चिंतित बेटी… “मम्मी, अभी तक ट्रेन नहीं चली है तो यहाँ कब आएगी…??” उसकी फिक्र जायज़ है, उसे इंटरव्यू की चिंता है। यहाँ से बंगलौर के मध्य कुछ गिनी-चुनी ट्रेन ही चलती है। जैसे-तैसे इस ट्रेन में रिजर्वेशन मिलने की मुश्किल पार कर खुश हुए थे, कि नई समस्या आन पड़ी, “अब जाने ये प्राणप्रिया कब छूटेगी” ??
सच में, घर से निकल…सरकारी सुविधाओं का लाभ सही समय पर मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं है। आप चाहे स्वयं को लाख करदाता समझें, आपकी औकात मंदिर के सामने खड़े भिखारियों से कम नहीं समझी जाती है।
जैसे-तैसे दोपहर १ बजे की ट्रेन रात ११ बजकर २० मिनट पर आई। राम… राम करते हम ट्रेन में बैठ गए, तब ऐसा लगा जैसे जग जीत लिया है पर लगता है कि परीक्षा तो अब शुरू हुई थी। हमारी सहृदया ट्रेन रास्ते पर पड़नेवाले प्रत्येक स्टेशन पर अपनी भव्य उपस्थिति दर्ज करा रही थी…, जबकि दूर-दूर तक कोई मेजबान दिखाई नहीं देता था। सच… कितनी फुरसत होती है ना हम भारतीयों के पास, आराम से ट्रेन में बैठे यात्री गप्पे मार रहे हैं, कोई मोबाइल में वीडियो देख रहा है, कोई गाने सुन श्रोता का फर्ज अदा कर रहा है। कहीं राजनीतिक बहस चालू है…” जानते हैं साहब, जल्द ही बुलेट ट्रेन भारत में दौड़ने लगेगी!” कितने भोले और मासूम होते हैं लोग, जिस सुपरफास्ट फुल एसी एक्सप्रेस ट्रेन में बैठे हैं, वह छिपकली-सी रेंग रही है और खुद को बुलेट ट्रेन का दिवा-स्वप्न देकर गर्व महसूस कर रहे हैं। सच… ये हमारा संगठित धैर्य ही है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी आम जनता को मिलनेवाली सुविधाएं अधिकतर सरकारी किताबों, नियमावली में प्राप्त होती है, जबकि ये आम जनता टूटी-फूटी गड्ढों से भरी रोड पर चलती है, भीड़ वाली घंटों लेट होती ट्रेन में सफ़र करती है, स्टेशन में लगे फुल साउंड में गूंजते बेवजह बातों का प्रचार करते माइक के नीचे बेंच पर बैठ ट्रेन आने की प्रतीक्षा करती है। कभी-कभी लगता है कि ये सही भी है, क्योंकि जनता के पास तो दिमाग ही नहीं होता है तो माइक की आवाज़ से उन्हें भला क्या डिस्टर्ब होगा ? फिर अच्छा भी तो नहीं लगता, सरकार से इतनी उम्मीद और शिकायत करना। इतना तो मिलता है कागज़ पर… तो सच्ची की सुविधाएं पाने की अपेक्षा ही क्यों करती हैं ये निकम्मी जनता…!! आराम से रहें… रस्ते पर गड्ढा आए तो उसमें पैर धोते हुए निकल जाएँ… यदि सौभाग्य से गड्ढे में गिर गए तो संसार की चिंताओं से मुक्ति, इंटरव्यू में लेट हो जाएँ तो अखबारों में भरी-पड़ी अन्य नौकरियों पर अप्लाई करें और लेट ट्रेन में बैठकर बुलेट ट्रेन का खूबसूरत सपना देखे। नेताओं की तरह आखिर कौन-सा हमारा करोड़ों का व्यापार चल रहा है जो दस-बीस घंटे लेट होने से लाखों का नुकसान हो जाएगा….??