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भीड़ के बीच बिखरा भरोसा

डॉ. शैलेश शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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भारत ने स्वतंत्रता के बाद से कई बड़े राजनीतिक आंदोलन देखे हैं। उनमें से कुछ ने सरकारें हिला दीं, कुछ अख़बारों की सुर्ख़ियों में ही दम तोड़ गए। फ़र्क़ अक्सर एक ही बात से पड़ता था कि आम आदमी घर से निकला या नहीं। जे.पी. का आंदोलन हो, २०११ में अन्ना का रामलीला मैदान हो या किसानों का साल भर चला धरना – तीनों में मुद्दा किसी न किसी रूप में हर घर तक पहुँच गया था। अब हर जगह यह सवाल पूछा जा रहा है कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ अभियान को जनता का साथ क्यों नहीं मिल रहा। सवाल जायज़ है, पर उसके भीतर एक मान्यता छिपी है कि साथ मिला ही नहीं। उसे परखे बिना आगे बढ़ना ठीक नहीं होगा।
परखने पर पहली बात यह निकलती है कि सीजेपी को जनता का साथ मिला था और ख़ूब मिला। मई २०२६ में बने इस व्यंग्यात्मक संगठन के इंस्टाग्राम फ़ॉलोअर हफ़्ते भर से कम में २.२ करोड़ से ऊपर पहुँच गए। संसद के मानसून सत्र के पहले दिन देशभर से हज़ारों लोग दिल्ली आए। एनईईटी-यूजी २०२६ के पेपर लीक पर हफ़्तों जंतर-मंतर पर धरना चला और २५ जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया। सीजेपी उनके इस्तीफ़े को पहले से ‘अनिवार्य’ माँग बता रही थी। जो आंदोलन मंत्री की कुर्सी ले जाए, उसे जन-समर्थन से वंचित कहना अन्याय होगा। पेपर लीक की चोट भी सीधी थी, क्योंकि वह उन परिवारों पर पड़ती है जिनके बच्चे बरसों तैयारी करते हैं। दिक़्क़त बाद में शुरू हुई। सीजेपी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग पर दूसरी लहर चलाई। मुद्दा था- मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर। पेपर लीक में हर माँ-बाप को अपना नुक़सान दिखता है। मतदाता सूची की बहस में पहले समझाना पड़ता है, कि नुक़सान क्या है और किसका है। फ़र्क़ मेरे अनुमान से यहीं पड़ा। यह किसी सर्वे का नतीजा नहीं, मेरा अपना अंदाज़ा है।
१० अक्टूबर की भीड़ पर फ़ैसला सुनाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि उस दिन दिल्ली कैसी थी। पुलिस ने जंतर-मंतर पर अनुमति देने से पहले ही मना कर दिया था। उसका कहना था कि वहाँ एक हज़ार लोगों की ही गुंजाइश है। ६० हज़ार से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी लगाए गए, ४ किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट बंद रहा, मेट्रो के कई स्टेशन बंद हुए और सर्वोच्च न्यायालय को दख़ल देकर कहना पड़ा कि आम यात्रियों को बेवजह तकलीफ़ न दी जाए।
फिर भी तस्वीर को पूरी तरह सफ़ाई देने लायक़ नहीं कहा जा सकता। १४ अक्टूबर को सह-संयोजक आशुतोष रंका और सौरव दास को पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। आंदोलन के तीनों बड़े चेहरे उस समय या तो हिरासत में थे या घर में पाबंद। वहाँ मौजूद एक प्रदर्शनकारी ने ख़ुद माना कि पहले जितने लोग नहीं हैं।
  सीजेपी की एक कमज़ोरी उसके जन्म में ही थी। नेशनल हेराल्ड अख़बार ने प्रशांत किशोर को उद्धृत किया है कि शुरुआती दिनों में यह सोशल मीडिया का अभियान भर था, जिसका कोई स्थापित सांगठनिक ढाँचा नहीं था। उन्होंने इसे बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और महँगाई से उपजी बेचैनी का संकेत भी बताया था।
   जिसके पास ढाँचा न हो और जिसकी दिशा पर साथी भी उलझन में हों, उसके लिए ऑनलाइन लोकप्रियता को लंबी लड़ाई में बदलना मुश्किल होता है। विपक्ष की आपसी खींचतान मुझे सबसे ज़्यादा खटकती है। १९७७ में विपक्ष ने अपने दलों के झंडे उतारकर जनता पार्टी बना ली थी। कांग्रेस, आंदोलन के पहले महीने में जंतर-मंतर से जान-बूझकर दूर रही और पार्टी के भीतर अन्ना आंदोलन की याद का हवाला दिया गया, यानी डर कि ग़ैर-राजनीतिक आंदोलन कल प्रतिद्वंद्वी बन सकता है। यह रिपोर्टों में बताया गया कारण है, पार्टी का आधिकारिक बयान नहीं। राहुल ने खुलकर सीजेपी का समर्थन पहली बार १४ अक्टूबर को किया। जब एक ही मुद्दे पर लड़ने वाले एक-दूसरे को शक से देखें, तो आम आदमी क्यों माने कि यह जनता की लड़ाई है, मंच की नहीं ?
   राहुल गांधी के ‘वोट चोरी’ अभियान का हाल वरिष्ठ पत्रकार भावदीप कांग ने बयान किया है। उनकी दलील है कि मताधिकार भारतीयों के लिए लगभग पवित्र चीज़ है, इसलिए उसके हनन पर जनता को सड़क पर होना चाहिए था, मगर जिन राज्यों में एसआईआर हुआ, वहाँ पार्टियों के अपने कार्यक्रमों के सिवा कोई प्रदर्शन नहीं दिखा। उनके मुताबिक लोगों का ग़ुस्सा असुविधा पर है: ख़राब सॉफ़्टवेयर, उलझी प्रक्रिया, काम के बोझ से दबे बूथ-स्तर के अधिकारी। यह परेशानी सब दलों के समर्थकों ने उठाई, इसलिए लोगों के मन में बात ‘वोट चोरी’ की कम, ‘गड़बड़-झंझट’ की ज़्यादा बनी। कांग्रेस के भीतर भी कई नेता अभियान को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
  इनकी क़ानूनी ज़मीन भी आसान नहीं। बार एंड बेंच के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय ने २७ मई २०२६ को बिहार और दूसरे राज्यों के एसआईआर को वैध ठहराया। एक और बात है जो दोनों पक्षों को ध्यान में रखनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि आयोग नागरिकता की जाँच कर सकता है, पर उसका अंतिम फ़ैसला नहीं कर सकता और सूची में पहले से दर्ज मतदाताओं के पक्ष में अनुमान रखना होगा। अदालत की मुहर के बाद केवल नारे से काम नहीं चलता, प्रमाण चाहिए। यह मेरी राय है।
    पर विपक्ष के हाथ ख़ाली भी नहीं हैं। झगड़ा आँकड़ों की व्याख्या का भी है और सवाल पूछने का हक़ विपक्ष को है। उसका यह तर्क भी वज़नी है कि जब राजधानी में प्रदर्शन की जगह ही हटा दी जाए और नेता हिरासत में हों, तब ख़ाली सड़क को जन-समर्थन के अभाव का सबूत नहीं माना जा सकता।
   एक बात ईमानदारी से कहनी होगी। आज की जन-भावना नापने वाला कोई भरोसेमंद राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण मुझे नहीं मिला। ‘जनता ने साथ नहीं दिया’ इसलिए मापे हुए तथ्य से ज़्यादा अनुमान है, जो प्रदर्शनों की रिपोर्टों और टिप्पणीकारों की राय से बनता है। उसी अनुमान पर चलूँ तो मुझे लगता है कि पेपर लीक की चोट सबको दिखती थी, जबकि मतदाता सूची का दर्द ज़्यादातर लोगों को असुविधा लगा। सीजेपी के पास ढाँचा नहीं था और कांग्रेस से उसकी बनी नहीं। राहुल का आरोप जितना बड़ा था, उसके साथ रखे गए प्रमाण उतने बड़े नहीं दिखे, कम से कम अदालत और आम लोगों की नज़र में। फिर भी न सीजेपी की उपलब्धि छोटी है, न आयोग के भीतर की दरारें हल्की। एक युवा आंदोलन ने मंत्री से इस्तीफ़ा दिलवाया और आयोग के कामकाज पर बहस दोबारा खुल गई। आगे क्या होगा, मैं नहीं कहता। इतनी लंबी उम्र में अपनी भविष्यवाणियाँ मैंने ख़ुद ग़लत होती देखी हैं। हाँ, इतना पक्का है कि जनता को कोसने से आंदोलन आगे नहीं बढ़ते।