डॉ. विद्या ‘सौम्य’
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
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माँ के हाथों की लकीरें, घिस गईं थीं,
बर्तन मांजते…
पाँव की बिछिया दब गई थी,
रस्में निभाते…
घूंघट के नीचे ले लेती थी सिसकियाँ तब,
जब, याद आ जाते थे पीहर के नजारे
ब्रम्ह बेला में ही पीस-कूट लेती थी,
गुनगुनाते अनाज के दाने,
भर लाती थी गाँव के बीच में बने,
पक्के कुएं से ताजा पानी।
अपने भीतर के उमड़ते सैलाब को,
पतीले को रख चूल्हे की आँच पर,
जलाकर अपने अरमानों को,
लकड़ियों और कंडों की राख पर
परोस देती थी सबकी थाली में सारा स्नेह,
सबने पूछा- “खाना कैसा बना है ?”
किसी ने न पूछा-“तू थक तो नहीं गई, काम करते ?”
माँ… दूसरों की ख्वाहिशों के रंग चुनकर,
कर लेती थी अपने जीवन के रंग फीके।
दर्द को बनाकर चन्दन का लेप,
लगाती रही माथे की लकीरों पर,
शायद…
महक जाएगा एक दिन दुर्भाग्य मेरा,
शायद…।
बदल जाएगा यौवन का… सौभाग्य मेरा,
इसी धारणा में बीते कई साल,
और…
पीड़ा की अग्नि में जलती रही बारम्बार॥