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वैवाहिक समारोह में बढ़ता दिखावा नुकसानदायी

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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भारतीय संस्कृति में विवाह एक पवित्र, अटूट और आध्यात्मिक संस्कार है, जो २ आत्माओं और परिवारों को सात जन्मों के लिए जोड़ता है। विवाह में अग्नि को साक्षी मान कर सप्तपदी और सात वचन ही विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होता है, जो वर-वधू को जीवनभर साथ निभाने का वादा कराते हैं।
सदियों से हिंदू संस्कृति के अनुसार य़ह एक ऐसा धार्मिक बंधन है, जिसे तोड़ा नहीं जा सकता और यह वर- वधू के वैवाहिक जीवन के सुखद और प्रगतिशील होने की कामना करता है, परंतु परिवर्तनशील समाज में विवाह संस्कार अब सम्पन्नता का भौण्डा प्रदर्शन बनता जा रहा है।
मध्यवर्गीय परिवार हमेशा से समाज में अपनी हैसियत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने में विश्वास करते रहे हैं। धनी वर्ग के पास तो पैसे का भंडार भरा है, तो वह अपनी सम्पन्नता का प्रदर्शन करना अपना हक समझते हैं। उदाहरण के लिए अम्बानी के बेटे की शादी या किसी भी फिल्मी सितारे की शादी का भव्य आयोजन करके अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करते हैं। अब मध्यम वर्ग भी इस दिखावे में उन लोगों से पीछे नहीं रहना चाहते हैं। शादी-ब्याह का मौका इस दिखावे का सहज माध्यम बन चुका है। अब तो शादी की सालगिरह में भी शादी जैसा भव्य आयोजन देखा जाने लगा है और बच्चों की सालगिरह में भी खूब दिखावा होने लगा है।
पहले शादी की सालगिरह जैसे आयोजन नहीं सुनाई पड़ते थे। आज हम पश्चिम की नकल करते बहुत प्रसन्न होते हैं, लेकिन कई पश्चिमी पर्यटक हमारे पाँच सितारा होटलों में राजसी ठाठ-बाट से पारंपरिक हिंदू विधि से शादी रचाते देखे जाते हैं ।
मध्यमवर्गीय परिवार और शहरों में विवाह की पुरानी रस्म-रिवाजों को भूलते जा रहे हैं, और नए-नए शौक दिखाई पड़ रहे हैं। इनमें प्री-वेडिंग का शौक अनिवार्य हो गया है, जब लड़का-लड़की पसंद का स्थान चुन कर वहाँ अपनी रोमांटिक तस्वीर खिंचवाते हैं, जिसका प्रदर्शन बड़े पर्दे पर विवाह समारोह में मेहमानों के सामने किया जाता है। अपनी व्यक्तिगत तस्वीर को समारोह में सबके सामने प्रदर्शित करना सर्वथा अनुचित है।
दूसरा चलन महिला संगीत का है। पहले ढोलक की थाप पर महिलाएँ बन्ना, बन्नी, गाली, सुहाग गीत आदि पारंपरिक, आँचलिक गीत और नृत्य करते अपनी खुशी जाहिर करतीं थीं। विवाहोत्सव में गीत- संगीत से समां बँध जाता था, परंतु अब उसी का संशोधित, परिष्कृत, भ्रष्ट, विकृत या ऐसा ही कुछ महिला संगीत भी कहा जाता है। इसका प्रचलन और विस्तार इतना अधिक हो गया है, कि धनाढ्य वर्ग तो फिल्मी सितारों को बुलाकर मंच पर प्रदर्शन कराते हैं।
हम क्यों कम की तर्ज पर अभी मध्यमवर्ग स्वावलंबी हैं, किंतु प्रदर्शन में पीछे नहीं हैं। महीनों पहले से नृत्य-संगीत की तैयारी शुरू हो जाती हैं। बहू-बेटियाँ अपने अपने नृत्य, कौशल और कला का भव्य मंच पर प्रदर्शन करने के लिए कोरियोग्राफर के इशारे पर महीनों तक अभ्यास करती हैं और फिर आपके समक्ष प्रदर्शन करती हैं। यह बात दूसरी है, कि सब कुछ फिल्मी तर्ज की नकल करके किया जाता है। डांस फ्लोर सबसे जरूरी हो गया है। प्रतिभा के प्रदर्शन के इस आयोजन में कमर मटकाऊ डांस जरूरी हो गए हैं। इस समय लोगों को यही रुचिकर भी लगता है। यह बात अलग है, कि लोग अपने खाने- पीने में लगे रहते हैं और मंच पर कलाकार प्रदर्शन करते रहते हैं। कभी-कभी कोई गुणी रसिक बंधु थोड़े समय बैठकर इसका आनंद ले लेते हैं।
विवाह समारोह अब पूरी तरह से इवेंट मैनेजिंग कम्पनी के इशारों पर संचालित होने लगा है। रीति-रिवाज और रस्मों के स्थान पर अब मेहँदी और हल्दी मुख्य समारोह बन चुका है।
विवाह समारोह में दुल्हन के लँहगे और दूल्हे की शेरवानी की कीमत आज लाखों में पहुँचती जा रही है, जो जीवन में एक बार ही पहना जाता है। हल्दी के समय में दुल्हन आजकल पारंपरिक वेश-विन्यास साड़ी या लँहगे की बजाय अश्लील सा गाउन या लहँगा-चोली और आँखों पर काला चश्मा लगा कर दूल्हे का हाथ पकड़ कर थिरकती हुई आती हैं,जो भारतीय पारंपरिक संस्कृति से बिल्कुल अलग है, परंतु अब जमाना ही बदल रहा है और आधुनिकता की आँधी में परंपरा और संस्कृति को बचा पाना एवं निभाना मुश्किल होता जा रहा है।
इवेंट कम्पनी के उद्घोषक आजकल तरह-तरह के गेम खिलाते हैं, जिसमें रिश्तेदार और युवा भी भाग लेते हैं। पूरे समय छायाकार का भी महत्वपूर्ण रोल रहता है। पुराने समय में हल्दी चढ़ाने की रस्म विवाह का महत्वपूर्ण रिवाज होता था, जिसमें परिवार के सभी बड़े लोग हल्दी लगाने की रस्म निभाते थे, परंतु अब इवेंट वालों के इशारे पर वर, वधू और माता-पिता या रिश्तेदार नाचते रहते हैं।
एक चलन और बढ़ता जा रहा है कि थीम के कलर के अनुरूप कपड़े पहनना और उसी के अनुसार सजावट करना। ऐसे ही पीना- पिलाना भी कहीं खुलेआम तो कहीं चोरी-छिपे जरूरी-सा हो चुका है।

विवाह समारोह में अब दिखावा हावी हो चुका है। पार्टी में सैकड़ों आइटम का भौंडा प्रदर्शन करना ही है। ५ सितारा या बड़े-बड़े रिजार्ट्स से शादी में भव्य सजावट द्वारा अपने वैभव का प्रदर्शन करना ही रह गया है। अब ऐसे समारोह पारंपरिक रीति-रस्म के स्थान पर अपनी सम्पन्नता का प्रदर्शन सजावट, भव्यता, दिखावा, इवेंट कम्पनी और छायाकार का दबदबा बन कर रह गए हैं।