ललित गर्ग
दिल्ली
***********************************
कुरुक्षेत्र स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में २ महीने में ४ छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं केवल एक संस्थान की त्रासदी एवं नाकामी नहीं हैं, बल्कि पूरे भारतीय समाज, शिक्षा व्यवस्था और हमारी सामूहिक संवेदनहीनता पर लगा गहरा प्रश्नचिह्न हैं। ये घटनाएं हमें झकझोरती हैं, कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियाँ हैं, जिनमें देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं जीवन से हार मानने को विवश हो जाती हैं। कोई भी युवा, जो कठिन प्रतिस्पर्धा से गुजरकर ऐसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचता है, वह सहज रूप से जीवन का परित्याग नहीं करता, वह तब यह निर्णय लेता है जब उसे हर ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देता है। यह अंधकार केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक, पारिवारिक और संस्थागत विफलताओं का सम्मिलित परिणाम है। एक बड़ा सवाल है, कि इस तरह छात्रों का आत्मघात करना क्या सपनों का बोझ है या तंत्र बनाम व्यवस्था की नाकामी ?
आज भारत का भविष्य कहे जाने वाले युवा जिस मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के बोझ तले दबे हैं, वह अभूतपूर्व चिन्ताजनक है। कोटा जैसे शिक्षा नगरों में हर वर्ष दर्जनों छात्र आत्महत्या करते हैं। इन घटनाओं को हम आँकड़ों में बदल देते हैं, लेकिन हर आँकड़े के पीछे एक जीवित सपना, एक संघर्षरत परिवार और टूटती उम्मीदों की कहानी होती है। अन्य शिक्षा केंद्रों में भी बढ़ती आत्महत्याएं इस बात का संकेत हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में कुछ मूलभूत त्रुटियाँ हैं। यह केवल पढ़ाई का दबाव नहीं है, यह उस मानसिक संरचना का संकट है, जिसमें सफलता को जीवन का पर्याय बना दिया गया है और असफलता को जीवन का अंत।
भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार २०१८-२३ dके बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में ९८ छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें सबसे अधिक घटनाएं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हुईं। इसके बाद एनआईटी और केंद्रीय विश्वविद्यालयों का स्थान है। यह तथ्य इस धारणा को तोड़ता है कि केवल कमजोर छात्र ही मानसिक तनाव का शिकार होते हैं। सच्चाई यह है, कि सबसे प्रतिभाशाली और संवेदनशील छात्र ही अक्सर सबसे अधिक दबाव महसूस करते हैं, क्योंकि वे स्वयं से अत्यधिक अपेक्षाएं रखते हैं और असफलता को स्वीकार नहीं कर पाते। यहाँ प्रश्न केवल संस्थानों का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का भी है, जिसने सफलता को एक संकीर्ण परिभाषा में बांध दिया है। परिवार अपने बच्चों को बचपन से ही यह सिखाते हैं कि जीवन का लक्ष्य केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता है। अभिभावक अपने सामर्थ्य से अधिक खर्च कर कोचिंग संस्थानों में बच्चों को भेजते हैं, बैंक से कर्ज लेते हैं और अपनी अधूरी इच्छाओं को बच्चों के माध्यम से पूरा करने का प्रयास करते हैं। यह अपेक्षाओं का बोझ बच्चों के मन पर इतना भारी पड़ता है कि वे स्वयं को एक परियोजना की तरह देखने लगते हैं, इंसान की तरह नहीं। जब यह प्रोजेक्ट असफल होता है, तो उन्हें लगता है कि उनका अस्तित्व ही निरर्थक हो गया है।
शिक्षा व्यवस्था का ढांचा भी इस संकट के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चों को ज्ञान तो देती है, लेकिन जीवन जीने की कला नहीं सिखाती। उन्हें बताया जाता है कि गणित कैसे हल करना है, लेकिन यह नहीं सिखाया जाता कि जीवन की समस्याओं का समाधान कैसे करना है। यह नहीं बताया जाता कि मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखना है।परिणामस्वरूप, जब वे वास्तविक जीवन की चुनौतियों से सामना करते हैं, तो टूट जाते हैं। आज के शिक्षण संस्थानों में शिक्षक और छात्र के बीच का संबंध भी बदल गया है। पहले शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संरक्षक होते थे। आज यह संबंध औपचारिक हो गया है। कई शिक्षक अपनी भूमिका को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रखते हैं।
विचित्र बात है कि जो देश दुनिया भर में अपनी संतुलित जीवनशैली एवं अहिंसा के लिए जाना जाता है, वहाँ के शिक्षा-संस्थानों में हिंसा का भाव पनपना एवं छात्रों के आत्महंता होते जाने की प्रवृत्ति का बढ़ना अनेक प्रश्नों को खड़ा कर रहा है। ऐसे ही अनेक प्रश्नों एवं खौफनाक दुर्घटनाओं के आंकड़ों ने शासन-व्यवस्था के साथ-साथ समाज-निर्माताओं को चेताया है और गंभीरतापूर्वक इस विडम्बनापूर्ण एवं चिन्ताजनक समस्या पर विचार करने के लिए जागरूक किया है, लेकिन क्या कुछ सार्थक पहल होगी ? बहुत जरूरी है कि उच्च शिक्षण संस्थान अपनी कार्यशैली में आमूल-चूल परिर्वतन करें। फिलहाल जरूरी यह भी है कि इन संस्थानों में एक ऐसे तंत्र को विकसित किया जाए, जो निराश, हताश और अवसादग्रस्त छात्रों के लगातार संपर्क में रहकर उनमें आशा का संचार कर सके, उन्हें सकारात्मकता के संस्कार दे सके। इसके लिए स्थाई तौर पर कुछ मनोवैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं। केवल जांच समितियाँ बनाना समस्या का समाधान नहीं है। समितियाँ रिपोर्ट दे सकती हैं, लेकिन वे खोए हुए जीवन को वापस नहीं ला सकतीं। आवश्यकता इस बात की है, कि हम समस्या की जड़ तक पहुंचें और उसे दूर करने के लिए ठोस और दीर्घकालिक उपाय करें।
इस समस्या का समाधान केवल नीतिगत बदलावों से नहीं होगा, बल्कि सामाजिक आंदोलन की आवश्यकता है। सबसे पहले, हमें शिक्षा की परिभाषा को बदलना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक संतुलित और सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिए। छात्रों को यह सिखाया जाना चाहिए कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।
दूसरे, अभिभावकों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। उन्हें अपने बच्चों को यह समझाना होगा कि वे उनसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, न कि उनकी सफलता। उन्हें बच्चों पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ नहीं डालना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने सपनों को पहचानने और पूरा करने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। तीसरे, शिक्षण संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से समझना होगा। उन्हें केवल अकादमिक उत्कृष्टता पर नहीं, बल्कि छात्रों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना होगा।
निश्चित तौर पर समाज को भी अपनी संवेदनशीलता को पुनर्जीवित करना होगा। हमें यह समझना होगा कि हर जीवन अमूल्य है और किसी भी सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है। हमें एक ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहां बच्चे बिना किसी भय के अपने सपनों का पीछा कर सकें और असफल होने पर भी सम्मान के साथ जी सकें। यदि हम इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते, तो यह संकट और गहराता जाएगा। अब समय आ गया है कि हम इस विफलता को स्वीकार करें और इसे सुधारने के लिए एकजुट होकर प्रयास करें। तभी हम अपने युवाओं को इस आत्मघाती मार्ग से बचा सकेंगे।