बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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सहयोग वह मौन अनुबंध होता है,
वह करुणा की अस्थाई छाया होता है।
जो मनुष्य को मनुष्य तो बनाए रखता है,
इस सभ्यता के कठोर तट पर।
यह कोई दया नहीं होता है,
जब इतिहास ने हड्डियों से हथियार पहली बार गढे़ होंगे।
तब भी अस्तित्व के पक्ष में,
भय के विरुद्ध, किसी ने किसी का हाथ थामा होगा ।
सहयोग तभी से जन्मा,
जब अकेलेपन ने आत्मसमर्पण किया होगा।
और समूह ने संभावना में संघर्ष को बदला होगा,
शब्द सरल है, परंतु इसका व्याकरण बड़ा कठिन है।
इसमें ‘हम’ का अभ्यास है,
और ‘मैं’ का लोप है ।
यह वह कला है, जहां ज्ञान तो साझा होता है,
पर शक्ति झुकती है।
और श्रम भी सम्मान में परिवर्तित हो जाता है,
जो सहयोग नहीं करता, वह सिर्फ जीवित रहता है ।
लेकिन जो सहयोग करता है,
वह जीवन रच देता है पीढ़ियों के लिए ।
सहयोग के गारे से,
समाज की प्रत्येक ईंट जुड़ी होती है।
अन्यथा तो सभ्यता,
सिर्फ विचारों का एक ढहता हुआ ढांचा ही होता है।
किसान और भूमि के मध्य,
शिक्षक और शिष्य के मध्य, समाज और स्त्री के मध्य
हर जगह सहयोग ही तो है,
जो संघर्ष को संतुलन देता है।
अगर सहयोग नहीं हो तो,
प्रतिस्पर्धाएं हिंसक बन जाती हैं।
विकास असमान और,
प्रगति कुछ व्यक्तियों के लिए विशेषाधिकार बन जाते हैं ।
सहयोग शक्ति का विवेक पूर्ण विस्तार है क्षरण नहीं,
यह सामूहिक विजय का दीर्घ सूत्र है पराजय नहीं।
जब स्त्री समाज के साथ आगे बढ़ती है,
तभी सहयोग न्याय में रूपांतरित होता है।
बिना शोर के सहयोग भी क्रांति कर देता है,
व्यवस्था बदल देता है बस नारे नहीं लगाता है।
जहां आज संवाद टूट रहा है, विश्वास भी दायरे में सिमट रहा है,
वहां सहयोग सबसे बड़ा प्रतिरोध बन रहा है।
यह समय मांगता है कि हम केवल प्रश्न न उठाएं,
उत्तर ढोने का साहस भी रखें, एक- दूसरे के साथ।
क्योंकि भविष्य सहयोग से लिखी हुई एक सामूहिक पांडुलिपि है,
किसी अकेले की खोज का परिणाम नहीं॥