सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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स और हित को जोड़िये,
बनता है साहित्य
स्वान्तःसुखाय लिखा जो,
वही हुआ साहित्य।
मन की ही अनुभूति है,
रचना का आकार
लिखते हैं यह सोच कर,
मिले सभी का प्यार।
दर्पण है साहित्य यह,
जिस समाज का काल
रचनाओं से ही दिखे,
उस समाज का हाल।
कला शब्द संयोग की,
भाषा का माधुर्य
सार्थक रचनाएँ सब,
कहलाती साहित्य।
सभी काल के कवियों ने,
किया इसे परिभाषित
कहने के ढंग अलग हैं,
एक बात ही भाषित।
विषय बहुत यह है विषद,
रचना का आधार।
एक-एक रचना जोड़कर,
बन जाता आकार॥