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विरह का संगीत

कमलेकर नागेश्वर राव ‘कमल’,
हैदराबाद (तेलंगाना)
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विरह की वेदना ने मुझे पत्थर बना दिया,
पर भीतर प्रेम का दीप जलता रहा।

आँसुओं की धारा बहती है निरंतर,
उसमें डूबा है मेरा मन, मेरा अंतर।
तेरे बिना कोई रंग नहीं, कोई राग नहीं,
तेरे बिना कोई सुख नहीं, कोई भाग नहीं।

विरह की वेदना ने मुझे मौन कर दिया,
पर भीतर प्रेम का स्वर गूँजता रहा।

रातें लम्बी, दिन सूने, सब कुछ वीरान,
तेरे बिना जीवन है जैसे टूटा सामान।

तेरे बिना मैं अधूरा हूँ, टूटा हुआ,
तू ही है मेरा जीवन, तू ही है सदा।
ओ प्रिय, लौट आ, इस विरह को थमा दे,
मेरे जीवन में फिर से प्रेम बहा दे।
तेरे बिना मैं बस छाया हूँ, अस्तित्व अधूरा,
तू ही है मेरा जीवन, तू ही है नूरा।
विरह का संगीत हर पल गूँजता है,
तेरे बिना जीवन अधूरा सा लगता है।

ओ प्रियतम, लौट आ, कर दे सुख संचार,
विरह वेदना मिटा दे, भर दे प्रेम अपार॥

परिचय – कवि व अनुवादक कमलेकर नागेश्वर राव का साहित्यिक उपनाम ‘कमल’ है। आप सरकारी अध्यापक (हिंदी) ने रूप में जिला नागर कर्नूल के वेल्दंडा में कार्यरत हैं। तेलंगाना राज्य के रंगा रेड्डी जिले में निवासरत ‘कमल’ की तेलुगू और हिंदी के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ व विशेष आलेख प्रकाशित होते रहते हैं। इनको श्री श्री कला वेदिका राजमंड्री वालों से ‘साहिती मित्रा’ पुरस्कार, आदित्य संस्कृति (मप्र) से ‘हिंदी सेवी’ तथा डाॅ.सीता किशोर खरे स्मारक साहित्य पुरस्कार आदि मिले हैं।