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मध्यरात्रि का सूरज

संजय एम. वासनिक
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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जहाँ अंधकार ने दरवाज़े पर,
जंजीरें डाल रखी थीं
वहीं आपका जन्म हुआ,
आपने पूछा कि कुछ लोगों को
ज़मीन पर क्यों रेंगना पड़ता है ?
किताबों को कवच और,
कानून को प्रकाश मानकर
अंतहीन रात में आपने रास्ता बनाया।

उन्होंने आपकी जाति को तौला,
आपकी योग्यता या बुद्धि को नहीं
लेकिन आप इतने ऊँचे खड़े रहे कि,
कोई चाहकर आप तक पहुँच ना सका
अदालतों में आवाज़, पढ़ने का अधिकार,
चलने को रास्ता, नेतृत्व करने का हक
यह सब आपकी देन है…।

पानी से वंचित लोगों से
नदियों को मोड़ने तक,
आपने हर किसी को
सिखाया कि आज़ादी
कैसे कमाई जाती है,
भीख माँगकर नहीं,
उधार लेकर नहीं,
हाथों से बनाई जाती है
और लिख दिया आपने,
देश के लिए एक संविधान।

इसलिए जब भी
हम बोलते हैं,
पढ़ते हैं, उठते हैं,
कुछ करते हैं,
तो हम यह महसूस
करते हैं कि आप,
मध्यरात्रि के
आकाश के सूरज हैं।

आठ दशक बीत गए,
आपकी गरज अभी भी
कायम है।
बाबासाहेब,
आप आज भी मार्गदर्शक हैं॥