भोपाल (मप्र)।
‘रामायण’ और ‘महाभारत’ कविता में लिखे गए उपन्यास हैं। रामायण योजनाबद्ध तरीकों से लिखा गया सुसंगठित समाज है, जबकि महाभारत में आपको भटक जाने का पूरा-पूरा खतरा है। यदि लेखक इतिहास की तरफ जाता है। इतिहास को शामिल करता है तो तथ्यों की प्रमाणिकता जरूरी है।
वरिष्ठ कवि-आलोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने यह सूत्र भोपाल की साहित्यिक जमात को स्मृति शेष कवि-उपन्यासकार प्रो. हरीश पाठक के उपन्यास ‘गाँठें’ पर चर्चा में दिया। जनवादी लेखक संघ (भोपाल) के बैनर तले दुष्यंत कुमार स्मृति पाण्डुलिपि संग्रहालय में हुए इस कार्यक्रम में अध्यक्षीय आसंदी से डॉ. सिंह ने ‘गाँठें’ की गाँठों को खोलते हुए कहा कि यह उपन्यास बनते और ध्वस्त होते रिश्तों की तलाश है। दिमाग में हलचल मचाने की कोशिश स्पष्ट है। उन्होंने नसीहत दी कि यदि आप पूरे समय और दुनिया को रेखांकित नहीं कर पाते हैं, तो आपके लेखक होने पर सवाल उठना लाजिमी है।
मंच के सूत्रधार कवि राजेश जोशी ने साहित्य में लगभग साथ-साथ कदमताल करनेवाले लेखक मित्र प्रो. पाठक का परिचय देते हुए कहा कि डॉ. शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ की पीढ़ी के बाद जिन कवियों की सर्वांधिक चर्चा हुई, उनमें प्रो. पाठक प्रमुख हैं। आलोचक रामप्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि ‘गाँठें’ का शिल्प अनकहे को कैसे कहा जाए, इससे ऊपर की बात करता है। यह समाज की तमाम गाँठों को प्रेरित करनेवाला उपन्यास है। कथाकार शंशाक,कवि-उपन्यासकार सविता भार्गव ने भी अपनी भावना व्यक्त की।
संघ के प्रांतीय अध्यक्ष वीरभद्र जैन ने आभार व्यक्त किया।