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कसूर तुम्हारा

डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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तुम ना पढ़ो तो
कसूर तुम्हारा है,
हम तो हर लफ्ज़ में
तुम्हें ही लिखते है।

तुम ना समझो तो
कसूर तुम्हारा है,
हम तो हर शब्द में
प्रेम कहानी कहते हैं।

तुम ना मानो तो
कसूर तुम्हारा है,
हम तुम्हारी खामोशी के
हर अल्फ़ाज को सुन लेते हैं।

तुम ना जानो तो
कसूर तुम्हारा है,
हम हर रात तुम्हारी याद में
आँसू का दरिया बहाते हैं।

तुम ना आओ तो,
कसूर तुम्हारा है।
हम आस लगाए बैठे हैं,
झुठलाओ न इस आस को तुम॥