कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
**********************************************
बड़े शहर की भीड़ में सावित्री नाम की एक विधवा अपने छोटे से संसार के साथ जी रही थी। उसके जीवन का एकमात्र सहारा थी उसकी ११ वर्ष की बेटी रिया। दिनभर वह घर-घर जाकर बर्तन माँजती और रात को सिलाई करती। उसके हाथों की मेहनत का एक ही सपना था कि रिया पढ़-लिखकर डॉक्टर बने।
लोग अक्सर कहते, बेटी को भी काम पर साथ ले जाया कर, लेकिन सावित्री मुस्कुराकर कहती, मेरी बेटी मजदूरी नहीं, पढ़ाई करेगी।
एक दिन वह रिया का हाथ पकड़ बड़े कॉन्वेंट स्कूल पहुँची। साधारण वेशभूषा देखकर लोगों ने उसका उपहास किया, पर सावित्री का विश्वास अडिग रहा। एक दयालु शिक्षक की सहायता से रिया का दाखिला हो गया। उस दिन माँ की आँखों में वर्षों बाद सच्ची खुशी उतर आई।
समय बीतता गया। सावित्री ने और अधिक मेहनत करनी शुरू कर दी, ताकि रिया की पढ़ाई और ट्यूशन का खर्च उठा सके। रिया भी मन लगाकर पढ़ती रही।
एक शाम विद्यालय की छुट्टी के बाद सावित्री समय पर नहीं पहुँच सकी। अँधेरा घिरने लगा। तभी एक ऑटो चालक ने रिया से पूछा कि कहाँ जाना है। मासूम बच्ची ने बिना संकोच उसके साथ जाना स्वीकार कर लिया, लेकिन वह आदमी इंसान नहीं, हैवान था। उसने रिया को बेहोश कर पैसों के लालच में बेच दिया। इसके बाद कई दिनों तक उस मासूम पर अमानवीय अत्याचार होते रहे। वह हर बार हाथ जोड़कर घर जाने की विनती करती रही, पर किसी का हृदय नहीं पसीजा।
उधर, सावित्री अपनी बेटी को ढूँढने के लिए दर-दर भटकती रही। उसकी हर सुबह एक नई उम्मीद और हर रात टूटे हुए दिल के साथ बीतती थी। आखिरकार कई दिनों की तलाश के बाद पुलिस ने रिया को सुरक्षित बचा लिया और अपराधियों को कानून के हवाले कर दिया।
जब रिया अपनी माँ से मिली, तो दोनों देर तक एक-दूसरे से लिपटकर रोती रहीं। सावित्री ने आँसू पोंछते हुए कहा, मुझे पता था, मेरी बेटी एक दिन ज़रूर लौटेगी।
उस दिन दोनों ने ठान लिया कि अब किसी भी बेटी का भरोसा यूँ नहीं टूटने देंगे। कहते हैं, किसी भी समाज की असली पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी बेटियों की सुरक्षित मुस्कान से होती है।