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सदगुरु ने राह दिखाई

सरोज प्रजापति ‘सरोज’
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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मेरे भाग्य विधाता (शिक्षक दिवस विशेष )…

मोह-माया के जाल में घिरी,
झूठे जग को लेकर दौड़ी
अंधकार में जकड़ी घिरी,
सतगुरु जी, ने मुझे राह दिखाई।

धन-दौलत के लोभ में फिरती,
चारों पहर माया में जकड़ी
अपने मन को चंचल करती,
दिन-दिन सतगुरु ‘जरा’ में जकड़ी।

मेरी नैया भंवर में डोली,
मैं तो मुख से सदगुरु बोली
मेरे गुरु की कृपा न्यारी,
तारणहार, सदगुरु मैं उबारी।

मेरा-मेरा हर दिन करती,
लालच में निशि-दिन चलती
बैर, विरोध मन मलीन करती,
सदगुरु जी, मैं नर्क में जकड़ी।

ये जीवन है चौसर की बाजी,
रैन आए फिर खत्म बाजी
जग बीच आए, पल-पल गंवाए,
सदगुरु जी, मुझे तेरा सहारा।

बिन सदगुरु मैं क्या जानूं!
तृण-तृण जोड़ पल-पल गवाऊं
राख की ढेरी, मन क्या जानूं ?
सदगुरु जी, तेरा नाम ध्याऊं।

भटका मन, गुरु ने राह दिखाई,
अंधकार में रौशनी दिखाई
धन्य-धन्य मैं गोविंद मिलाई,
सदगुरु जी, मेरी नींद भगाई।

कह ‘सरोज’ अब न भटकूं,
सरोज हरि पद शरण पकडूं।
सरोज सुमन अर्पित निहारूं
नित्य-प्रति सदगुरु गुन गाऊं॥

परिचय-सरोज कुमारी लेखन संसार में सरोज प्रजापति ‘सरोज’ नाम से जानी जाती हैं। २० सितम्बर (१९८०) को हिमाचल प्रदेश में जन्मीं और वर्तमान में स्थाई निवास जिला मण्डी (हिमाचल प्रदेश) है। इनको हिन्दी भाषा का ज्ञान है। लेखन विधा-पद्य-गद्य है। परास्नातक तक शिक्षित व नौकरी करती हैं। ‘सरोज’ के पसंदीदा हिन्दी लेखक- मैथिली शरण गुप्त, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा हैं। जीवन लक्ष्य-लेखन ही है।