कुल पृष्ठ दर्शन :

प्राकृतिक असंतुलन है ज्यादा बादल फटने की वजह

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
******************************

जब किसी इलाके में एक निश्चित अवधि में अधिक बारिश होती है, तो उसे बादल फटना कहते हैं।   

   आईएमडी के अनुसार यदि २० या ३० वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में १०० मिलीमीटर बारिश होती है तो उसे बादल फटने की घटना कहा जाता है। उत्तराखंड में बादल फटना एक बेहद खतरनाक और अचानक होने वाली प्राकृतिक घटना है, जिसमें १ घंटे से भी कम समय में छोटे से क्षेत्र में १०० मिलीमीटर से अधिक भारी बारिश होती है, जिसके कारण अचानक भयंकर बाढ़ (फ्लैश फ्लड) और बड़े पैमाने पर भू-स्खलन होता है, जिससे घर, पुल और सड़कें तबाह हो जाती हैं। तापमान में परिवर्तन होने के कारण जब गर्म हवाएं ऊपर की ओर उठती हैं तो वह अपने साथ नमी भी लेकर जाती हैं। ऊपर पहुँचने के साथ यह गर्म हवा, ठंडी हवा में परिवर्तित हो जाती है, जिससे हवा के साथ नमी पानी की बूँदों में परिवर्तित हो जाती है। यह बूँदें आपस में कई सारी बूँदों से मिल जाती हैं, जिससे इसका घनत्व बढ़ जाता है और अचानक से एक निश्चित इलाके में भारी बारिश होती है।
   सरल भाषा में कहें तो हिमाचल और उत्तराखंड में क्षेत्रीय जलचक्र में तेजी से बदलाव होता है। इससे इनमें मौजूद नमी बड़े आकार के बादल बनकर भारी वर्षा कराते हैं। हाल के वर्षों में मानसून के दौरान बादल फटने की घटनाओं में काफी बढ़ोतरी हुई है।
    उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाओं के दृश्य जन साधारण के दिल को दहला देते हैं और मन में जिज्ञासा होती है, कि उत्तराखंड में ही ज्यादातर बादल फटने की घटनाएं क्यों घटित होती हैं…?
दरअसल, उत्तराखंड एक हिमालयी राज्य है और हिमालय की पहाड़ियाँ बादलों के सामने अवरोधक बन कर खडी हो जाती हैं। परिणामस्वरूप बादल पहाड़ों से टकरा कर फट जाते हैं। बादल जल वाष्प से भरे होने के कारण एकसाथ उसी पहाड़ी की घाटी में बरस पड़ते हैं, यह तो एक सामान्य कारण है, परंतु विगत कुछ वर्षों से उत्तराखंड में ऐसी घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं, जिसकी वजह से बाढ़ और जान-माल की बहुत हानि हो रही है। इन बढ़ती घटनाओं के कारण उत्तराखंड को ‘आपदा प्रदेश’ कहा जाने लगा है।
उत्तराखंड में बादल फटने का मुख्य कारण है प्रकृति का अत्यधिक दोहन, जिसके कारण उत्तराखंड में प्राकृतित संतुलन खराब हो गया है और उत्तराखंड में बादल फटना (क्लाउड बर्स्ट इन उत्तराखंड) और हिमखंड फटने (ग्लेशियर्स बर्स्ट) जैसी घटनाएं ज्यादा हो रही हैं।
   उत्तराखंड में बादल फटने के मुख्य कारण में यहाँ बाँध का अधिक बनना भी है। उत्तराखंड में बाँधों के रूप में जल का रुकाव अधिक है, जिसके कारण जल वाष्प से अधिक बादलों का निर्माण होता है या बादल अधिक भारी हो जाते हैं और फिर यहीं घाटियों से टकरा कर बादल फटने की घटना को अंजाम देते हैं। ऐसे ही उत्तराखंड में पेड़ों का अधिक दोहन या आग से जंगलों का नष्ट हो जाना भी वजह है। पेड़ प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, क्योंकि तापमान संतुलित रहता है। पेड़, भू-स्खलन को रोकने में सबसे ज्यादा सहायक होते हैं। आजकल हम सभी देख रहे हैं, कि तापमान में असंतुलन पैदा हो गया है। यानी पेड़ों की कमी के कारण ‘ग्रीनहाउस’ गैसों का प्रभाव बढ़ गया है।       
  आजकल उत्तराखंड का ही नहीं, पूरे विश्व का तापमान असंतुलित हो गया है, और इसी असंतुलन के कारण चमोली आपदा की घटना हुई थी। इसी असंतुलन के कारण बादल फटने जैसी घटनाएं होती हैं।
        बादल फटने की घटना एक प्राकृतिक घटना है, पर वर्तमान समय में प्रकृति के अत्यधिक दोहन या प्राकृतिक असंतुलन के कारण यह अधिक बढ़ती जा रही हैं। इनको पूरी तरह से रोका तो नहीं जा सकता, परंतु कम किया जा सकता है-
◾पानी को रोकने की प्रवृत्ति को कम करना-
   बाँधों का निर्माण कम करना, जिससे बादल कम बनें और प्राकृतिक संतुलन बना रहे। बाँध मानव जीवन में लाभ से अधिक हानिकारक ज्यादा हैं।
◾वृक्षारोपण और जंगलों को आग से बचाना-
   ये आवश्यक है कि प्राकृतिक संतुलन को बनाने के लिए रामबाण उपाय किया जाए। अर्थात् सबसे उपयोगी उपाय है वृक्षारोपण, क्योंकि जहाँ वन अधिक होंगें वहाँ प्राकृतिक आपदाएं निश्चित रूप से कम होंगीं। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को पकड़ कर रखती हैं, जिसके कारण भू-स्खलन नहीं होता है।
    उत्तराखंड में लगातार भू-स्खलन और भूमि के धंसाव की घटनाएं अब गंभीर संकेत दे रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है, कि यदि मनुष्य अपने स्वार्थ और लालच के कारण प्रकृति से छेड़छाड़ बंद नहीं करेगा, तो आने वाले समय में भयावह परिणाम भुगतने होंगें। वैज्ञानिकों का मानना है, कि तेजी से होता जलवायु परिवर्तन भी एक बड़ा कारण है, जो अधिक वाहनों के आने, जंगलों की आग और अंधाधुंध पेड़ों की कटाई का कारण है।
अब सवाल यह नहीं है, कि बादल फटेंगें या भूस्खलन होगा ! ये सब तो होता ही रहेगा। मुख्य प्रश्न तो ये है, कि क्या हम पहाड़ों की सीमाओं का सम्मान करना चुन सकेंगें या तब तक बार-बार वही गलतियाँ दोहराते रहेंगें, जब तक बचाने लायक कुछ शेष ना रह जाए।