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चप्पल 

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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हर घर उजियारा हो (दीपावली विशेष)…

पूरे गाँव में साफ-सफाई चल रही थी। छोटा-सा गाँव था, पर खुशियाँ अपार थीं। सभी एक-दूसरे से बातों में मस्त रहते थे।
उसी गाँव में एक छोटी-सी लड़की रहती थी – मुनिया। मुनिया के पिता किसी बीमारी से मर गए थे। अब घर में बस मुनिया और उसकी माँ रहती थीं। माँ सिलाई करके, लोगों के कपड़े सी कर और घर-घर बर्तन मांज कर गुजारा करती थी।
     आज दुकानों में और घरों में भी बड़ी चहल-पहल थी। सब बच्चे अपने माँ-पिताजी से पटाखे के लिए पैसे मांग रहे थे। मुनिया भी अपनी माँ के साथ बाजार गई। थोड़ा चावल, दाल, सब्जी और थोड़ी मिठाई खरीद ली, पर मुनिया की नजर एक दुकान में टंगे एक नए कपड़े पर बार-बार जा रही थी। माँ समझ गई। मन में सोचा – दीवाली पर बेटी के सारे अरमान पूरे करूँगी, पर माँ के पास पैसे कम थे, इसलिए उसने उस समय कुछ नहीं खरीदा और चुपचाप घर आ गई।
घर आकर माँ रात-दिन सिलाई करके पैसे जोड़ती रही। फिर मुनिया को पैसे देकर बोली – “बेटी, जा, बाजार से अपनी पसंद का कपड़ा खरीद ला।”
   मुनिया जब बाजार गई, सब बच्चे पटाखे, मिठाई और रंग-बिरंगे कपड़े खरीद रहे थे। मुनिया भी दुकान पर पहुँची। दुकानदार बोला – “आओ बेटा, दीपावली की बधाई! कपड़ा ले लो।”
तभी मुनिया की नजर दुकान की सीढ़ियों पर पड़ी। सबने अपनी-अपनी चप्पल खोल कर रखी थी। तभी उसे अपनी माँ के खाली पैर याद आ गए।
      उसकी माँ हमेशा नंगे पैर ही मजदूरी करने जाती थी। कड़कड़ाती ठंड में भी, तपती धूप में भी बिना चप्पल के घर-घर जाकर बर्तन साफ करती थी। पैर धूप में झुलस जाते थे, ठंड में ठिठुर जाते थे।
मुनिया सोचने लगी – “कपड़ा तो मैं पुराना-फटा भी पहन सकती हूँ, पर मेरी माँ… अगर माँ के लिए एक चप्पल ले लूँ, तो धूप में पैर नहीं जलेगा, ठंड में ठंड नहीं लगेगी। माँ को कितनी खुशी मिलेगी!”
दीपावली पर अपनी खुशी से ज्यादा, अपनों की खुशी अच्छी होती है। यह सोचकर उसने कपड़ा नहीं लिया। उसी पैसे से माँ के लिए चप्पल का एक डिब्बा ले लिया।
सब बच्चों के हाथों में पटाखे थे, पर मुनिया के हाथ में चप्पल का डिब्बा था। सब उसे देखकर हँस रहे थे, पर मुनिया खुश थी।
वो मन में बोली – “सबका पेट मिठाई खाकर भरेगा, पर मैं खुश रहूँगी अपनी माँ के पैरों में चप्पल देखकर। मेरी माँ ही मेरे लिए लक्ष्मी और गणेश जी हैं। मैं अपनी माँ की ही पूजा करूँगी। अगर मेरी माँ खुश है, तो सारे त्योहार मेरे लिए अच्छे हैं।”
और उस दीपावली पर मुनिया और उसकी माँ सबसे ज्यादा खुश थीं।
  आज मुनिया बड़ी हो गई थी। माँ भी बूढ़ी हो गई, पर बचपन की यादें फिर से एक बार अबकी दीवाली उसे याद आने लगी। उस पल को याद कर के मुनिया खुश भी थी और आँखें भी भर आई थी।
सीख– सच्ची दीपावली नई चीजें खरीदने में नहीं, अपनों के अंधेरे पैरों में रोशनी बनने में है।