Visitors Views 80

बिल्ली और चूहा

डॉ. हंसा दीप
टोरंटो (कैनेडा)
**************************

बीड़ी के कश खींचता हुआ वह लगातार ताक रहा था उस ओर,जहाँ आकाश और धरती एक होने जा रहे थे। सुबह की चहल-पहल शुरू हो गई थी। सभी मर्द खेतों की ओर जा रहे थे। मंगल्या बहुत देर से यूँ ही बैठा था। रात में भी न सो पाया था,न खा पाया था। कमली ने भी कुछ नहीं खाया था। कटोरदान जैसा का तैसा भरा पड़ा था।
बच्चे की साँसें जब धौंकनी की तरह चलती हैं तो वह बेबस-सा पूरी झोपड़ी के चक्कर काटता-काटता हाँफने लगता है। कमली को देखता रहता है जो आँखों में आँसू लिए सीना सहलाती रहती है उसका। कोई न कोई व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी। किसनू से माँगे ? कुछ उधार तो दे ही सकता है, मगर है ही क्या उसके पास ? कल शाम को ही तो रोना रो रहा था कि आजकल बीड़ी पीने तक की जुगाड़ नहीं हो रही। फिर बदीया ? नहीं, वह तो किसना से भी गया बीता है। कोई नहीं दे सकता अभी। सभी हाथ झाड़ कर बैठे हैं। अब कहाँ से लाए सौ रूपए ? अगर समय पर दवा नहीं मिली तो लड़का खतम। डॉक्टर बाबू का कहना है कि इसे निमोनिया है। शहर से इंजेक्शन मंगाकर लगाने पड़ेंगे,नहीं तो लड़का गया हाथ से। न जाने कितने टोने-टोटके करने के बाद तो इस लड़के का मुँह देखा है उसने,और अब वह चला गया तो उसका क्या हाल होगा ? और कमली ? वह तो मर जाएगी बेचारी रो-रोकर।
आठ दिन तक रोज बिला नागा सत्तू ओझा ने झाड़-फूँक की,पर कोई फरक नहीं पड़ा। दिन-ब-दिन हालत बिगड़ती ही गई। आखिर डॉक्टर बाबू के पास जाना ही पड़ा। उसने सुन रखा था सरकारी अस्पताल में मुफ़्त दवा मिलती है,पर यहाँ पाँच-दस नहीं पूरे सौ रुपए माँगे उससे। बहुत देर जो हो गई थी। लड़के की जान खतरे में है अब। फसल का टेम होता तो वह सौ की जगह दो सौ खर्च कर सकता था पर अभी तो बीज अन्दर ही गया है,बाहर फूटा भी नहीं। माँगे भी तो किससे ? अभी सभी के यहाँ कड़की चल रही थी। बोवणी का समय जो था। इस समय तो किसान अपनी खेती के लिए सब-कुछ कुर्बान कर चुका होता है,इस आशा में कि जब फसल लहलहाएगी,तब हर कहीं पैसा होगा,पर इस वक्त जो यह मुसीबत आन पड़ी,उसका क्या करे? एक पल को बनिए का ख्याल आया। उसकी आँखें चमक गईं,पर दूसरे ही पल बुझी आँखों से वह बीड़ी के बचे ठोड़े को जमीन पर घिसने लगा। आज तक उसने कभी किसी बनिया-महाजन से उधार नहीं लिया था। खेती और फिर मेहनत-मजदूरी कर जरूरत के पैसे कमा लेता था वह। उसके सभी नाते-रिश्तेदार उसकी किस्मत की सराहना करते। कहते- ‘एक बार किसी बनिए के चंगुल में फँसों तो कभी निकल नहीं सकते। पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी करके भी कर्जा पूरा नहीं कर सकते।’
ऊँह,जो होगा देखा जाएगा। लड़के को अगर बचाना है तो इस समय महाजन ही एक रास्ता है। माथे का उघड़ा साफा कसकर बाँधते हुए चल दिया वह। हल्की लालिमा बिखेरता सूरज धीरे-धीरे बढ़ रहा था,आकाश के बीचों-बीच। सारे रास्ते मन में उथल-पुथल मची रही,पर उसका चेहरा एकदम शान्त था। मन में बड़ी उम्मीदें बाँधे सेठ नानालाल की पेढ़ी पर चढ़ा वह। सफेद-झक गादी-तकिए बिछे थे। एक ओर मक्का-ज्वार का ढेर था,दूसरी ओर कई बोरियाँ एक के ऊपर एक करीने से जमी हुई थीं। बीच में बड़े-बड़े पल्ले वाली तराजू थी। पेढ़ी चढ़ते-चढ़ते मंगल्या के शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। दोनों हाथ जोड़ कर बोला- ‘राम-राम सेठ।’
चश्मे से एक नज़र देख,सेठ फिर कुछ चितरने लगे,लम्बी-सी पोथी पर-‘हूँ वात से भाया मक्की जोइए ?'(क्या बात है भाई, मक्का चाहिए ?)
‘नी सेठ मारे एक मुसीबत पड़ी से। थोड़ाक ढींगला जोइए।’ (थोड़े पैसे चाहिए।)
‘आवो-आवो,अंई बैठो।’
हाथ के कागज-पोथी नीचे रख तकिए से पीठ टिका ली सेठ ने।
‘केवा गाम रे तू ?’
“अंई-पीपड़ीपाड़ा।”
‘पीपलीपाड़ो तो आखो गाम मारी आसामी (ग्राहक) से। तू तो केरा भाले नी पड्यो ?’
(तुझे तो कभी देखा नहीं)
‘हूँ तो पेली वखत (पहली बार) उधार लेवा आव्यो सेठ।’
‘केतरा ढींगला जोइए?’ (कितने पैसे चाहिए
?)
‘पूरा एक सौ,वी पचौल (बीस गुणा पाँच)। धान पाके तारे हूँ जमा करावी दी।’
‘हूँ नाम से तारो ?’
‘मंगल्यो’
‘बा (पिता) नो नाम ?’
‘वीरो’
‘ढोर (मवेशी) से ?’
‘से,बे गावड़ी ने एक डगरी। बे खेत से।’ (हैं, दो गाय और एक भैंस। दो खेत हैं।)
‘तारा बाजू माँ कुण रे ?’
‘किसनो पूँजो।’
‘हो हो,पेलो तो मारो आसामी से। चाल तारो काम पक्को। ले अँई अंगूठो लगाड़ दे।’
एक सफेद-चक कागज पर नीली स्याही से अँगूठा ठोक दिया उसने। सेठ ने गल्ला निकालकर दस-दस के कड़कड़ाते नोट पकड़ा दिए मंगल्या को और कहा-‘काम पड़े तो बेधड़क याँ आवजे।’
सेठ को राम-राम कर पेढ़ी उतरते-उतरते जैसे पर लग गए उसके। सुन तो बहुत रखा था उसने,पर यह मालूम नहीं था कि पैसा इतनी सहजता से मिल जाएगा। अगर ये रुपए आज न मिलते तो उसका लड़का मर जाता। भगवान सेठ को खूब सुखी रखे। विपत्ति का मारा इंसान किसी का सहारा मिलने पर कितना खुश हो जाता है,मंगल्या का दमकता चेहरा इसका प्रमाण था।
लड़का फिर से हँसने-खेलने लगा था। जब भी मंगल्या उसे किलकारियाँ मारते देखता, सेठ को सौ-सौ दुआएँ देता। कमली भी खूब खुश थी। अब के उसे भी नई ओढ़नी दिला देगा,तार-तार हो चली है। झुलड़ी (चोली) में भी तो कितने थेगरे (पैबंद) लग गए हैं। इस बार नई फूलड़े वाली सिला देगा। बिचारी कित्ती सीधी है,कभी कुछ माँगती नहीं। इसकी जगह और कोई बयरी (पत्नी) होती तो कभी की नातरे (अन्य पुरुष के साथ) चली गई होती।
यूँ इस बार पानी भी अच्छा पड़ा है। भगवान ने चाहा तो खूब फसल होगी। पावडर भी लाकर छिड़क दिया था। इसलिए इल्ली या कोई कीड़ा लगने का डर भी नहीं रहा। किसानों की मेहनत सफल हुई। खेत लहलहाने लगे। मंगल्या दो बार पचास-पचास भुट्टे सेठ के घर दे आया था। उसे आश्चर्य तो तब हुआ था जब सेठ ने उसे पोटला खाली करते वक्त देख कर आँखें फेर ली थीं। कुछ कहा नहीं था। मंगल्या कुछ न समझकर राम-राम कह कर चल दिया था। सोचा बड़े लोगों के पास कहाँ इतना टेम होता है ? फिर सेठ की तो बहुत बड़ी-बड़ी असामी है। उसने तो मात्र सौ रुपए ही निकलवाए हैं।
फसल आते ही उसने सबसे पहले धान बेचकर सौ रुपए गिने और सेठ के यहाँ पहुँचा। सेठ ने नाम पूछकर रजिस्टर खोला, कुछ हिसाब-किताब किया और बोला-‘एक सौ ने साठ रुपया ब्याज समेत।’
मंगल्या धक से रह गया,तत्काल ही सिर झटक दिया-‘कैसा मूरख है वह ब्याज तो लगेगा ही।’ कभी-कभी उसकी बुद्धि जाने कहाँ चली जाती है। ब्याज का पैसा जोड़ना तो बिल्कुल ही भूल गया पर अब साठ रुपए कहाँ से लाए ? दूसरी जरूरतें भी तो थीं।
‘सेठ एक सौ जमा कर लो,बारा पचोल (बारह गुणा पाँच) फेर आल दी।’ (बाद में दूँगा।)
सेठ ने कुछ लिखकर एक अँगूठा और लगवा लिया और यह हिदायत भी दी कि इस बार दूसरी जगह धान बेचा सो बेचा,भविष्य में वह किसी दूसरी दुकान पर माल न बेचे। अपना आदमी होकर ऐसा करता है! साथ रहते अपने पास-पड़ोसियों को भी समझा कर यहाँ लाए।
फसल कटाई के बाद की व्यस्तता अब कम हो गई थी। अधिकतर लोग अपनी मस्ती में रहते थे। शाम पड़ते ही कोई दारू चढ़ा लेता, तो कोई बाँसुरी पर तराना छेड़ देता,तो कोई नई शादी की जुगाड़ करने लगता। एक दिन मंगल्या ऐसे ही सुस्ती में बैठा बीड़ी फूँक रहा था कि फटफटी पर कमर कसे हुए दो जवान आए। मंगल्या देखते ही समझ गया कि आगे वाला सेठ नानालाल का लड़का है। कहीं कर्जा पटाने तो नहीं आया है? उसके पेट में धुकधुकी चल गई। पर जब लड़के ने बताया कि उसकी बहन की शादी है और दो दिन के लिए मजदूर चाहिए तो उसकी जान में जान आई।
मंगल्या और उसके साथ चार-पाँच भील शादी में काम करते रहे। पानी भरने से लेकर बरतन माँजने तक। इसके बदले उन्हें थाली भर कर पूरियाँ और नुक्ती मिली। मजूरी के पैसे माँगने की हिम्मत न वे कर सके,न ही सेठ ने पैसे देने की तकलीफ की। पहली बार किसी सेठ के यहाँ शादी देखी थी उसने। क्या ठाठ-बाट थे! बैंड-बाजे,चमकती बिजली, बड़ा सारा मंडप और न जाने क्या-क्या! रोज कित्ते-कित्ते लोग जीमते थे। उसे तो दो जनों का पेट भरने की फिकर पड़ी रहती है। हूँह, कहाँ सेठ और कहाँ मंगल्या! कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली! अपनी-अपनी किस्मत है।
अब जब भी वह गुड़-तेल लेने बाजार जाता, सेठ की दुकान के पीछे से जाता ताकि सेठ उसे देखकर किसी काम पर न बिठा दे,या रुपयों की लताड़ ही शुरू न कर दे। खाली समय में पास बन रहे तालाब पर मजूरी के लिए जाया करता था वह। आस-पास के सभी लोग जाते थे। सुबह आठ बजे से शाम सात बजे तक हड्डे तोड़ने के बाद कुछ रुपए मिलते थे,पर हाँ, दाल-रोटी का खर्चा आराम से निकल आता था।
दिन और महीने बीत गए। फिर से बोवणी का समय आ गया लेकिन मंगल्या साठ रूपए जमा नहीं करवा पाया। दुबारा फसल आने पर ही अब संभव था। खैर,इस बार तो वह सेठ के यहाँ से अपना खाता कटवा ही देगा। यह सोचते हुए उसके माथे पर एक दृढ़ निश्चय की लकीरें उभर आईं। पहली बारिश जम कर हुई। सभी किसान बोवणी में लग गए। बीज जमीन में जाने के बाद भी पानी मांगता है। सभी की आँखें बादलों पर ही लगी रहीं। उज्जणियाँ (इन्द्र देवता को मनाने के लिए किया जाने वाला भोज) हुईं,बकरे की बलि दी गई,पर पानी नहीं बरसा। देवी मैया का कोप कहो या इन्द्र देव की रीस (क्रोध)। बादलों के दर्शन तक के आसार नजर नहीं आते। जिनके यहाँ कुएँ-मोटर थे वो तो तिर गए,लेकिन जो पानी के लिए बादलों पर निर्भर थे वे तबाह हो गए। मंगल्या को भी फसल का आधा हिस्सा मुश्किल से मिल पाया। अगली बोवणी के लिए बीज बचा कर रखना मुश्किल हो गया। फिर भी उसने सब खर्चों को अनदेखा कर,माल ले जाकर सेठ से साठ रुपये काटने को कहा।
सेठ ने रजिस्टर निकाला और गुर्राया-‘साठ रुपया काट लूँ। और ब्याज कुण तारो बाप देगा ?’
‘यो ब्याज तो है,मूल तो परके जमा कर दियो थो।’
‘अरे तो ब्याज को ब्याज नी लगेगो ?’
काँप गया मंगल्या। सूखे होठों पर जीभ फेर कर बोला-‘केतरा थया ?’ (कितने हुए)
‘अठारा पचोल,एक सौ में दस कम।’
‘हूँ वात करो सेठ ?’
अब तीस रुपए कहाँ से लाए,ये तीस रुपए का बंदोबस्त नहीं कर सकता तो अगली बार जाने कितने हो जाएँगे,और कर भी नहीं सकेगा। ये सूखे की तंगी अगले २ साल तक चलेगी। निश्चित ही वह फँस गया है सेठ के चंगुल में। उसे कुछ सोचते देख सहानुभूति जताते बोला सेठ-‘तू फिकर क्यों करे,आवते साल जमा कर दीजे,हिसाब-किताब पूरो वई जाएगा।’
‘तमे हिसाब-किताब पूरो क्यों करो सेठ ? तमारा बाल-बच्चा भूखा मरी जाएगा।’ मन में बड़बड़ाते हुए उसने साठ रुपए कटवाए, अंगूठा लगाया और खड़ा हो गया। इस बार उसने राम-राम भी नहीं किया। एक नजर-भर सेठ की आँखों की ओर देखा। भूरी आँखें बिल्कुल उस बिल्ली जैसी लग रही थीं,जो एक बार चूहे को देखने के बाद उसे छोड़ती नहीं।