माया में फँसता अज्ञानी
डॉ.एन.के. सेठीबांदीकुई (राजस्थान) ********************************************* रचनाशिल्प:१०, ८, ८, ६…. माया में फॅंसता, ईश्वर भी हँसता कैसा मानव, अज्ञानी।जीवन भर रोता, कभी न सोता,करता है वह, नादानी।प्रभु से विरत रहे, पापरत रहे,करता रहता, मनमानी।माया है ठगिनी, जीवनहरिणी,कर देती ये, हैरानी॥ माया का बंधन, दिखता चंदन,अंत बड़ा ही, दुःख भरा।मन को भटकाता, रूप दिखाता,लगता है सब, हरा-हरा।नश्वर है … Read more