नारी का बदलता स्वरूप
बबिता कुमावतसीकर (राजस्थान)***************************************** वह नारी थी,छुई-मुई की तरह अपने में सिमटने वालीअंकुरित छोटे पौधे की तरह रखती थी मन में अनगिनत स्वप्न। उसने उपर उठने को,गर्दन उठायी ही थी किजीवन में चली जो कठोर हवाएँ, जो गर्माती थी उसके चेहरे को झुलसाती थीउसके अरमानों को हवा में,हल्के सूखे पत्तों की तरह उड़ा ले जाती थी। पिता के आँगन … Read more