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गांधारी-कृष्ण संवाद

संदीप ‘सरस’
सीतापुर(उत्तरप्रदेश)
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हे कृष्ण मुझे उत्तर दे दो,द्वारिकाधीश उत्तर दे दो।
मैं गांधारी हूँ पूछ रही,देवकीपुत्र उत्तर दे दो।

बोलो भाई को भाई से लड़वाना कैसा धर्म रहा ?
हे कृष्ण हमारे पुत्रों को मरवाना कैसा धर्म रहा ?
हे कृष्ण मुझे उत्तर दे दो,द्वारिकाधीश उत्तर दे दो।

पांडव वन में सन्तुष्ट रहे,तुमने उनको भरमाया क्यों ?
अर्जुन अपनों से युद्ध नहीं करता था,तो उकसाया क्यों ?
क्यों बाण पितामह से छीने क्यों सम्मुख किया शिखंडी को,
अश्वत्थामा की मृत्यु हुई,यह दुष्प्रचार था फैलाया क्यों ?

बोलो वो झूठ युधिष्ठिर से बुलवाना कैसा धर्म रहा ?
बोलो मेरे सौ पुत्रों को हरवाना कैसा धर्म रहा ?
हे कृष्ण मुझे उत्तर दे दो,द्वारिकाधीश उत्तर दे दोll

अभिशापित करती हूँ माधव,तेरा हो जाए वंशनाश,
विधवाएं तेरे घर बिलखें,तेरा हो जाए सर्वनाश।
जीवन के अंतिम क्षण तेरे एकांत और लाचार रहें,
जल की तृष्णा में प्राण तजो,तेरी अतृप्त ही रहे प्यास।

छलछंदों को ही धर्मयुद्ध बतलाना कैसा धर्म रहा ?
बोलो द्वापर के वैभव को कुम्हलाना कैसा धर्म रहा ?
हे कृष्ण मुझे उत्तर दे दो,द्वारिकाधीश उत्तर दे दो।

मैं कृष्ण बोलता हूँ माते! मेरे सारे उत्तर सुन लो,
जब लक्ष्यागृह षड़यंत्र रचा,आँखें मींचे तुम मौन रहीं।
जब दु:शासन ने केश द्रौपदी के खींचे,तुम मौन रहीं।
जब हुई शिखंडी राजसभा तुम भूल गई कर्तव्यबोध,
ओ निष्ठुर अपनी जिव्ह्य को दाँतों भींचे,तुम मौन रहीं।

लज्जा,सत्ता की चौसर पे लुटवाना कैसा धर्म रहा ?
बोलो कलंक अपने माथे लगवाना कैसा धर्म रहा ?
मैं कृष्ण बोलता हूँ माते! मेरे सारे उत्तर सुन लो।

क्यों भरी सभा में पांचाली का क्रंदन तुमने सुना नहीं,
क्यों पाण्डुपुत्र की पीड़ा से मन कभी तुम्हारा दुखा नहीं।
तुम माँ होकर अधिकार माँग लेती दुर्योधन दे देता,
अन्याय पांडवों ने झेला,कौरव से तुमने कहा नहीं।

बोलो ममता की मर्यादा झुठलाना कैसा धर्म रहा ?
बोलो माते! यह महायुद्ध रचवाना कैसा धर्म रहा ?

माते गांधारी आज सुनो,मैं महाधर्म बतलाता हूँ,
मेरा अंतिम उत्तर सुन लो,मैं धर्म सार समझाता हूँ।

अभिमन्यु निहत्थे को मारा,इसलिए कर्णवध उचित रहा,
एकलव्य द्वार से दुत्कारा,इसलिए द्रोणवध उचित रहा।
दुर्योधन ने जंघा खोली,फिर उस पर वार अधर्म नहीं,
खींचा था चीर दु:शासन ने,उसका संहार अधर्म नहीं।
निर्वीर्य भीष्म के हेतु शिखंडी की ललकार अधर्म नहीं,
दुःशासन का भी वक्ष चीर लोहू श्रृंगार अधर्म नहीं।

जब-जब अधर्म का भार बढ़ा,तब-तब मैंने अवतार लिया,
हर युग में धर्म सुरक्षा को,मैंने अधर्म संहार किया।

मानवता को पोषित करना ही सबसे सच्चा धर्म रहा।
युगधर्म पुनः घोषित करना ही सबसे सच्चा कर्म रहाll

परिचय-साहित्य जगत में संदीप मिश्र जाना-पहचाना नाम है,जो उत्तरप्रदेश के बिसवाँ(जिला-सीतापुर) में रहते हैंl सम्प्रति से कवि,साहित्यकार और समीक्षक के साथ ही संस्थापक-संयोजक(साहित्य मंच)तथा साहित्य सम्पादक (दैनिक समाचार-पत्र में) हैंl आपकी विशेष उपलब्धि कविता कोश व दोहा कोश में रचनाएँ सम्मिलित होना, राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं सहित टी.वी. चैनल,रेडियो से रचनाएं प्रकाशित-प्रसारित व पुरस्कृत होना हैl इनकी लेखन विधा-पद्य तथा गद्य भी हैl ५ जुलाई १९७५ को बिसवाँ में जन्मे श्री मिश्र ने एम.ए.(हिन्दी साहित्य)की शिक्षा हासिल की हैl प्रकाशन में आपके नाम-`कुछ ग़ज़लें कुछ गीत हमारे`(काव्य संकलन)तथा कई साझा संकलन भी हैंl ऐसे ही शीघ्र प्रकाश्य-गीत संग्रह एवं ग़ज़ल संग्रह आदि हैंl कार्यक्षेत्र-साहित्य तथा पत्रकारिता हैl कई अखबारों में नियमित स्तम्भ प्रकाशित कराते रहने तथा नियमित समीक्षा स्तम्भ में भी सौ से अधिक पुस्तकों की समीक्षा कर चुके `सरस` को सम्मान के निमित्त-उत्तर प्रदेश से बाल कविता हेतु पुरस्कृत(१९९४),साहित्य एवं पत्रकारिता के लिए पुरस्कृत (१९९६),साहित्य गौरव सम्मान(१९९७),सृजन सम्मान(१९९८),युवा कवि पुरस्कार(१९९९) तथा नेपाल द्वारा सन्त तुलसी स्मृति सम्मान(२०१९) सहित अन्य से भी सम्मानित किया गया हैl

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