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सम्मान की रक्षा करना प्रदाता का दायित्व

विचार गोष्ठी……

मंडला (मप्र)।

तालाबंदी ने ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’ की मान्यतानुसार ऑनलाइन प्रतियोगिताओं को जन्म दिया,और चल निकली प्रतिभागियों को अंकीय (डिजिटल) सम्मान-पत्र देने की परम्परा। सम्मान सदैव सम्माननीय होता है,पर आवश्यक यह भी है कि सम्मान पत्र के सम्मान की रक्षा करना सम्मान-पत्र प्रदाता का दायित्व है। जरूरत सीखने-सिखाने की है।
यह बात मुख्य अतिथि साहित्यकार प्रो.शरद नारायण खरे(मंडला) ने अपने शोधपूर्ण उद्बोधन में कही। अवसर था फेसबुक के ‘अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका’ के पृष्ठ पर आयोजित विचार गोष्ठी में ‘प्रसाद की तरह बांटे जा रहे डिजिटल सम्मान पत्रों का औचित्य’ विषय पर चर्चा का। देश के प्रसिद्ध वरिष्ठ कवि डॉ. खरे के मुख्य आतिथ्य,ऋचा वर्मा की अध्यक्षता व सिद्धेश्वर जी के संयोजन में यह गोष्ठी की गई,जिसमें अपूर्व कुमार(हाजीपुर),डॉ. अर्चना त्रिपाठी,मधुरेश नारायन,मनोज कुमार अम्बष्ठ,राजप्रिया रानी एवं गजानन पांडेय की भागीदारी रही। अन्य वक्ताओं ने भी प्रभावपूर्ण बातें कहीं। सिद्धेश्वर जी ने संचालन किया।

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