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ऐ इश्क़ वहीं ले चल हमें

अंजु चौधरी ‘अनु’
करनाल (हरियाणा)
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ऐ इश्क कहीं ले चल हमें,
जहाँ कल्पनाओं का संसार हो
जहाँ इक नूर की वादी हो,
इक ख्याब की दुनिया का
बसेरा हो,
जहाँ उम्र का न कहर हो।
ऐ इश्क वहीं ले चल हमें…

हम पर हमारी यादों का साया हो,
जहाँ पूरब दिशा से
प्रेम की गूंज उठती हो,
जहाँ,तुम मुझे और मैं तुम्हें
बहुत देर तक,यूँ ही देखते रहें ।
ऐ इश्क वहीं ले चल हमें…

इक ऐसी जगह जहाँ,
दुनिया के रस्मो-रिवाज़ न हों
वक़्त के आँगन में,
अपने अपने मौन के साथ
अभिव्यक्ति की नई परिभाषाएँ जोड़ दे,
पलाश की आग के संग
गुलमोहर के रंग हों,
और हो रजनीगंधा की गंध।
ऐ इश्क वहीं ले चल हमें…

लम्बी-सी ख़ामोशी के बाद,
निरर्थक से सवालों के भी
सच्चे-झूठे-मतवाले से जवाब हो,
सच्ची! पर हल्की-सी मुस्कराहट हो
जहाँ बिन पूछे दोनों को,
साथ बीते हर लम्हें का
सब कुछ याद हो।
चल इश्क! वहीं ले चल हमें…

जहाँ बारिश से बचने के लिए,
तुम हाथ बढ़ाओ अपना
और मैं बिना झिझक के,
थाम लूँ तुम्हें
और तुम्हारे पीछे खड़ी,
बारिश न थमने की कामना करुँ
पेड़ों के फूलों से पानी यूँ ही,
टपकता रहे
बारिश की बूंदे यूँ ही दोनों को
भिगोती रहें।
ऐ इश्क वहीं ले चल हमें,
ऐ इश्क वहीं ले चल हमें…

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