डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रत्येक लोकतांत्रिक राष्ट्र की आधारशिला है। यह प्रत्येक नागरिक को अपने विचार, भावनाएँ, मत तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति को निर्भय होकर व्यक्त करने का अधिकार प्रदान करती है। इसी स्वतंत्रता के कारण समाज में नवीन विचारों का आदान-प्रदान होता है, लोकतंत्र सशक्त बनता है तथा सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक प्रगति को गति मिलती है। साहित्य, कला, पत्रकारिता और जनसंचार के विविध माध्यम इसी स्वतंत्रता के कारण समृद्ध होते हैं, किन्तु प्रत्येक अधिकार के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़ा होता है। यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग असत्य प्रचार, घृणा फैलाने, धार्मिक या जातीय विद्वेष उत्पन्न करने, किसी की मानहानि करने अथवा राष्ट्र की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को क्षति पहुँचाने के लिए किया जाए, तो वह स्वतंत्रता नहीं, बल्कि दुरुपयोग बन जाती है। इसलिए किसी भी सभ्य समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं होती, बल्कि कानून, नैतिकता और सामाजिक मर्यादाओं से नियंत्रित रहती है।
आज सोशल मीडिया के युग में यह विषय और भी महत्वपूर्ण हो गया है। बिना सत्यापन के अफवाहें फैलाना, अपमानजनक टिप्पणियाँ करना, फर्जी समाचार प्रसारित करना अथवा व्यक्तिगत गोपनीयता का उल्लंघन करना समाज में तनाव और अविश्वास पैदा कर सकता है। अतः प्रत्येक नागरिक का दायित्व है, कि वह अपनी अभिव्यक्ति में संयम, सत्यनिष्ठा और संवेदनशीलता बनाए रखे।
निष्कर्षतः, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अमूल्य अधिकार है, परंतु इसकी सार्थकता तभी है जब इसका उपयोग सत्य, सद्भाव, न्याय और राष्ट्रहित के लिए किया जाए। स्वतंत्रता और मर्यादा का संतुलन ही एक स्वस्थ, जागरूक और उत्तरदायी समाज की पहचान है।
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥