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अहसास के पन्ने

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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रवि को लिखने की आदत बचपन से थी। उसकी जेब में हमेशा एक छोटी-सी डायरी रहती, जिसके पन्नों पर वह अपने अहसासों को दर्ज करता। शहर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में उसे अक्सर लगता-लोग बोलते बहुत हैं, सुनते कम; दिखते बहुत हैं, महसूस कम करते हैं।
कॉलेज के आख़िरी साल में उसकी मुलाक़ात मीरा से हुई। मीरा शांत थी, उसकी आँखों में एक ठहराव था-जैसे किसी झील की सतह, जिसमें आसमान खुद को देख सके। दोनों की दोस्ती किताबों से शुरू हुई, फिर चाय की प्यालियों तक पहुँची, और धीरे-धीरे दिल के भीतर उतर गई।
एक दिन मीरा ने रवि से कहा, “तुम बहुत लिखते हो, पर क्या कभी अपने बारे में भी लिखा है ?”
रवि मुस्कराया, “लिखता तो हूँ, पर शब्द अक्सर सच कहने से डर जाते हैं।”
मीरा बोली, “तो डर को भी लिखो, वही सबसे बड़ा सच होता है।”
समय बीता, रवि को नौकरी मिली, पर शहर बदलना पड़ा, दूरियाँ बढ़ीं। वीडियो कॉल पर मुस्कानें दिखतीं, पर खालीपन भी साथ रहता। मीरा के घर की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ गईं, रवि काम के बोझ में दबने लगा।धीरे-धीरे संवाद कम होने लगा।
एक शाम रवि थका-हारा कमरे में बैठा था। उसने डायरी खोली-वही पुरानी डायरी। पहले पन्ने पर मीरा की लिखी पंक्ति थी:
“जब शब्द थक जाएँ, अहसास लिखना मत छोड़ना।” उस पल उसे अहसास हुआ, कि वह भागमभाग में उन पन्नों को भूल गया था, जिन पर कभी जीवन मुस्कराया था।
उसने मीरा को फोन किया। दोनों देर तक चुप रहे। फिर मीरा बोली, “हमने साथ होना चाहा था, पर शायद साथ निभाना सीखना भूल गए।”
रवि ने कहा, “मैंने जीतने की दौड़ में, थामना छोड़ दिया।”
कुछ दिन बाद रवि छुट्टी लेकर लौटा। वे उसी पुरानी किताबों वाली दुकान पर मिले। बारिश हो रही थी। दोनों चुपचाप खड़े थे-बीच में बहुत कुछ टूटा हुआ था, पर टूटा हुआ हमेशा खत्म नहीं होता, कभी-कभी जुड़ने का रास्ता भी बनाता है।
रवि ने अपनी डायरी मीरा को दी। कहा, “इन पन्नों में मेरे डर, मेरी गलतियाँ और तुम्हारे बिना की खाली जगह है।”
मीरा ने डायरी लौटा दी, “इसे अपने पास रखो। अगर हम साथ हुए, तो नए पन्ने साथ लिखेंगे। अगर नहीं भी हुए, तो यह तुम्हें सिखाएगी कि अहसासों से भागा नहीं जाता।”
वे साथ नहीं रहे, पर दोनों बदले।
रवि ने लिखना फिर शुरू किया-अब प्रेम सिर्फ पाने की इच्छा नहीं था, वह समझ और स्वीकार का नाम बन गया। मीरा ने अपने सपनों के लिए कदम बढ़ाए। अब उसका ठहराव कमजोरी नहीं, आत्मसम्मान था।
सालों बाद रवि की किताब छपी, ‘अहसासों के पन्ने।’ भूमिका में उसने लिखा, “कुछ रिश्ते साथ रहने के लिए नहीं होते, कुछ रिश्ते हमें बेहतर इंसान बनाने के लिए होते हैं।”

यही कहानी उसका मील का पत्थर बनी, क्योंकि उसने उसे सिखाया कि सुख, दुःख, ग़म, जख़्म, मुस्कुराहट-सब मिलकर ही ज़िंदगी के पन्ने बनते हैं।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥