नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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कैदी हूँ मैं कैदी,
इस जग की कैदी
मिला है मुझको,
आजीवन कारावास
सब हैं मेरे पहरेदार,
मन से जा न सकूँ,
मन में आ न सकूँ
जग में रहूँ कैद,
एक कैदी जैसी
जग चाहे जब तक,
रखे कैद तब तक
हँस न सकूँ,
रो न सकूँ
गा न सकूँ,
मन की कभी
मन की कभी।
कैदी हूँ मैं कैदी,
हरदम रहूँ चुप-चुप
संशय में जिऊँ,
रहना है जग में तो
मानना है आदेश
दिन हो या रात,
सुबह हो या शाम
जो न मानूँ तो लगे,
कड़वी-कड़वी डाँट।
कैदी हूँ मैं कैदी,
एक-न-एक पहरेदार
हर वक्त रहे तैयार,
सुबह हो या शाम
जब छोटी-सी थी,
नन्ही गुड़िया
माँ-बाप का साया,
कसता शिकंजा
जब बड़ी हुई,
भाई का पहरा बढ़ा
हर वक्त दिन-रात,
स्वतंत्रता कहते किसको ?
यह जान नहीं पाई।
कैदी हूँ मैं कैदी,
इस जग की कैदी
शादी के बहाने,
एक पहरेदार हो जाते
अपने-आप तैयार,
हर क्षण बंधन में
रहना पड़ता जग में,
कहने के लिए होती हैं
लंबी-लंबी बातें,
पर कथनी-करनी में
होता बड़ा अंतर
यही है बंधन,
सुबह-शाम
जब उम्र गई बढ़,
बेटे का कसता शिकंजा
जब चाहे बढ़ता जाए,
पल-पल यह एहसास कराए।
कैदी हूँ मैं कैदी,
इस जग की कैदी
कुछ ऐसा न चाहे मन,
जिससे बंधन बढ़ता जाए
और भी गहरा हो,
कैदी होने का एहसास।
कैदी हूँ मैं कैदी,
इस जग की कैदी
सब हैं मेरे पहरेदार॥