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जगन्नाथ दर्शन दे दो

राधा गोयल
नई दिल्ली
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दिल करता है जगन्नाथ जी, दरस आपका पा जाऊँ,
इतनी हिम्मत दे दो मुझको, कभी उड़ीसा आ पाऊँ।

रथ की रस्सी को खींचूँ, और अपना जीवन धन्य करूँ,
एक बार तो बुला लो प्रभु जी, तुमसे आज गुहार करूँ।

चमत्कार जो सुने तुम्हारे, मुझे चकित कर देते हैं,
दरस तुम्हारा करने को प्रभु, मेरे प्राण तड़पते हैं।

प्रभु तुमने यह सत्य कर दिया, आत्मा कभी नहीं मरती,
न ही जलाई जा सकती है, न ही बहाई जा सकती। 

जब तुम गए थे परम लोक में, प्राण भले ही चले गए,
लेकिन अपने ब्रम्ह तत्व को, इसी लोक में छोड़ गए।

यादें जिन्दा रखने को, तीनों की मूर्तियाँ बनवाईं,
विशाल रथ पर तीनों की हर वर्ष झाँकियाँ निकलवाईं।

लाखों लोग इकट्ठा होकर, हाथ से रथ को खींचते हैं,
जो केवल छू ही पाते, वो खुद को धन्य समझते हैं। 

बारह वर्ष के बाद तीनों मूर्तियों को बदला जाता है,
जगन्नाथ जी की मूर्ति में विधिपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठान कराया जाता है।

कहते हैं कि तब उस कक्ष में अंधकार छा जाता है,
पुजारी की आँखों पर मोटा पट्टा बाँधा जाता है।

हाथों में भी एक कठोर परिधान चढ़ाया जाता है,
प्रधान पुजारी के अलावा जगन्नाथ को, कोई नहीं छू पाता है।

क्योंकि जगन्नाथ जी की मूर्ति के, दिल में धड़कन जिन्दा है,
देह भले ही भस्म हो गई, दिल अब तक भी जिन्दा है।

उस ब्रह्मतत्व में तेज है इतना, कैसे उसे बखान करें,
ज्ञान नहीं इतना कि कैसे शब्दों में गुणगान करें। 

ब्रह्मतत्व को निकालने को जब पुजारी हाथ बढ़ाता है।
जगन्नाथ के दिल की धड़कन, भली-भाँति सुन पाता है।

कहते हैं वो ब्रह्म अंश है, कोई देख न पाता है।
मूर्ति का दिल धड़क रहा, महसूस उसे कर पाता है।

तेरी लीला तू ही जाने, तेरी लीला अपरम्पार,
तेरा दर्शन कर पाऊँ प्रभु, इतना-सा कर दो उपकार॥