नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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‘प्रेम’ भावनाओं का केंद्र बिंदु है। ईश्वर भावनाओं से ही प्राप्त होते हैं। ईश्वर धन, दौलत और सम्पत्ति से प्रसन्न नहीं होते; धन-दौलत से अहंकार उत्पन्न होता है, और अहंकार ईश्वर को अप्रिय है।
यह विचारणीय प्रश्न है, कि प्रेम कैसे प्राप्त हो। प्रेम में हार-जीत नहीं होती, केवल प्रेम होता है। इसमें समर्पण का भाव प्रमुख होता है। विश्वास की नींव पर ही प्रेम का महल खड़ा रहता है। प्रेम वह कशिश है, जो हर पल बढ़ती जाती है। विपरीत परिस्थितियों में भी जो प्रेम बना रहे और बढ़ता रहे, वही सच्चा प्रेम कहलाता है। जो घटता-बढ़ता रहे, वह प्रेम नहीं, स्वार्थ होता है। अनमोल रिश्ते प्रेम से ही बनते हैं।
प्रेम रूपी वृक्ष की अच्छी देखभाल से ही प्रेम बढ़ता है, अन्यथा वह मुरझा जाता है। प्रेम को अच्छी तरह समझकर ही करना चाहिए, क्योंकि प्रेम मज़ाक नहीं, सच्चे मन का भाव है। जिस प्रकार फूलों में खुशबू बसती है, उसी प्रकार हृदय में प्रेम बसता है। दिखावे मात्र से प्रेम नहीं होता; प्रेम को दिल से महसूस करना पड़ता है।
प्रेम का कोई निश्चित स्वरूप नहीं है; यह विश्वास का आधार है। सच्चा प्रेम निराकार होते हुए भी जीवन को साकार करता है। प्रेम एक शक्ति-पुंज है, जो जीवन में प्रसन्नता भर देता है। प्रेम एक जीत और उमंग है, जो सबके हृदय में उठती है। यह अंधकारमय जीवन में नया सवेरा लाता है।
प्रेम एक आदर्श है, जो दुनिया को चलाता है। राधा-रानी का प्रेम, श्री कृष्ण का प्रेम, श्री राम का प्रेम, शबरी का प्रेम और सूरदास का प्रेम—ये सभी प्रेम के साक्षात स्वरूप हैं। प्रेम शाश्वत है; यह मोह या लालच नहीं, बल्कि सजीवता है। श्री कृष्ण की सभी लीलाएँ प्रेम के वश में हैं। प्रेम भावनाओं का केंद्र बिंदु है।
प्रेम के बिना मनुष्य का जीवन व्यर्थ हो जाता है। प्रेम उसी को प्राप्त होता है, जिसका हृदय निर्मल होता है। प्रभु भी उसी को अपनाते हैं, जिसका हृदय काम, क्रोध, मोह, मद और मत्सर से दूर हो। जिसके हृदय में माया का निवास होता है, ईश्वर उससे दूर रहते हैं। जिसके हृदय में दूसरों के प्रति दया, ममता, प्रेम, सहनशीलता और सहानुभूति जैसे गुण होते हैं, वही सच्चा प्रेम कर पाता है। जिनके हृदय में भावनाएँ जागृत होती हैं, उनके हृदय में प्रभु का वास होता है।
शरीर के पालन के लिए भोजन आवश्यक है, और मन के संतुलन के लिए प्रेम आवश्यक है। प्रेम हमें एक-दूसरे से जोड़कर रखने का कार्य करता है। प्रेम का पाठ हर व्यक्ति को सीखना चाहिए, जिससे हम आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकें।
प्रेम से ही परिवार, समाज, देश तथा विश्व में मानवता का महत्व बना रहता है। जीवन प्रेम-भरा होना चाहिए। इस धरती पर जन्म केवल भगवान को पाने के लिए पा सकें, यही प्रेम और भावनाओं का सच्चा महत्व है।