पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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आधुनिक मीरा ‘महादेवी वर्मा’ (पुण्यतिथि विशेष)…
महादेवी वर्मा को आधुनिक मीरा कहना तर्कसंगत है या नहीं, इस पर गहन रूप से विचार करना होगा, क्योंकि केवल एकांगी साम्य को देखकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं लगता।
जब हम मीरा बाई और महादेवी वर्मा की वेदना, दर्द के उद्गम स्त्रोत या उनके स्वरूप पर विचार करते हैं तो उन दोनों में मौलिक अंतर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। कदाचित् इसीलिए महादेवी वर्मा ने स्वयं अपनी तुलना मीराबाई से करना सर्वथा असंगत बताया है।
महादेवी वर्मा की कविता में सर्वत्र वेदना, करुणा की टीस और दर्द दिखाई पड़ता है। वेदना उनके जीवन में इस कदर घुल-मिल गई है कि वेदना ही उनके काव्य का प्राण है। विरहाग्नि के कारण ही उन्हें ‘आधुनिक काल की मीरा’ कहा गया है ।
मीरा की विरह वेदना में जो स्वाभाविकता, सरलता और सजीवता पाई जाती है, वही महादेवी वर्मा की विरह वेदना में है। वैसे तो महादेवी वर्मा करुणा में तो मीरा से बढ़कर हैं।
मीरा की वेदना व्यक्तिगत वेदना है। वह जन्मजात साधिका भक्तिन हैं। उनके आराध्य नटवर नागर कृष्ण हैं, जिसका परिचय उन्हें बचपन में ही हो चुका था और जिसकी मनोहारी मूर्ति एक साधु से मिल गई थी। मीरा तभी से अपने गिरिधर पर न्यौछावर हो गयीं थीं।
‘मीरा गिरिधर हाथ बिकानी‘
वे अपने प्रियतम के रूप और गुणों पर मुग्ध हैं, जिसकी लीला का गायन अपने पदों में तन्मयता से करती हैं-
‘बसो मोरे नैनन में नंदलाल
मोहनी मूरति, साँवरी सुरति नैना बने विसाल।‘
वे उस प्रियतम से अपनी बालपन की प्रीति को अपने पदों के माध्यम से उद्घोषित करती हैं।
यही नहीं, उनकी प्रीति जन्म- जन्मांतरों की है, क्योंकि वे पूर्वजन्म में गोपी ही तो थीं। वे गोपिका भाव अर्थात माधुर्य भाव से ही कृष्ण की आराधना करती हैं।
‘मेरी उनकी प्रीति पुराणी, उण बिन पल न रहाऊँ।‘
इस प्रकार मीरा का लक्ष्य स्पष्ट है, जिसे प्राप्त करने के लिए वह दृढ संकल्पित हैं।
‘निस दिन जोऊँ बाट पिया की, कबरु मिलहुगे आई।‘
मीरा के प्रभु आस तुम्हारी, लीज्यौ कंठ लगाई।‘
दूसरी ओर महादेवी गृहस्थ जीवन की विफलता एवं ससुराल के कटु अनुभवों से उत्पन्न पीड़ा से संतप्त होकर अव्यक्त की ओर उन्मुख हुईं, इसलिए उनकी वेदना का स्त्रोत लौकिक है; जिसे उनके दार्शनिक अध्ययन, मनन एवं चिंतन ने अद्वैतवाद के प्रभाव वश रहस्यवाद का रूप दे दिया। उनका प्रियतम अव्यक्त, निराकार होने के कारण अस्पष्ट है, जिसे वह प्रकृति में ढूंढने का प्रयास करती हैं।
‘कनक से दिन मोती-सी रात, सुनहली साँझ, गुलाबी रात
मिटाता रँगता बारम्बार कौन जग का चित्राधार’
‘मैं नीर भरी दुःख की बदली।’
स्वभावतः ही अव्यक्त होने के कारण उनके सामने अपने प्रिय का स्वरूप स्पष्ट नहीं है। इसके फलस्वरूप उनकी पीड़ा भी सच्ची अनुभूति से कम चिंतन मनन से अधिक प्रेरित लगती है। और वे इस वेदना को ही अपना लक्ष्य बना डालती हैं।
‘मैं विरह में चिर हूँ।’
महादेवी जी में अहं का भाव इतना प्रबल है और अपने स्वतंत्र अस्तित्व की रक्षा की आतुरता इतनी अधिक है, कि वे मिलन नहीं चाहतीं, क्योंकि मिलन होने पर उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। जलन का सुख निःशेष हो जाएगा। इस कारण वह अतृप्ति में ही जीवन की सार्थकता समझने लगती हैं।
‘मेरे छोटे जीवन में देना न तृप्ति का कण भर,
रहने दो प्यासी आँखें भरती आँसू के सागर।’
वस्तुतः, महादेवी की कविता भावुकता के ताने-बाने की कविता नहीं, उसमें चिंतन की छाप और कल्पना का उन्मेष है। वे विरह में रस ढूंढतीं हैं, सच्ची विकलता का अनुभव कम करती हैं। उनकी विरह वेदना की इसी बौद्धिकता को देखकर (जिसमें कल्पना का रंग इतना गहरा है, कलात्मक साज-सज्जा इतनी अधिक है) उनकी अनुभूति की सत्यता पर संदेह होने लगता है ।
कहाँ भक्त हृदय मीरा का उद्दाम भाव प्रवाह, कहाँ दार्शनिक महादेवी की बौद्धिकता। मीरा की अनुभूति प्रिय विरह के पर्वत से निकली हुई वेग से प्रवाहित तरंगिणी है, जो अपने भाव प्रवाह में सब कुछ अपने साथ में बहा ले जाती है।
उधर, महादेवी की अनुभूति सांसारिक पीड़ा की नदी से निकली हुई सुनियोजित नहर-सी प्रतीत होती है। जो धीरे-धीरे मंथर गति से, बढ़ती हुई मर्यादा के किनारों का कभी भी अतिक्रमण नहीं करती, जिसमें दार्शनिक चिंतन की शीतलता, विवेक की निर्मलता और सुचिंतित कलात्मकता है। जिसे अपने प्रियतम या सागर से मिलने की उत्कंठा नहीं है, वह इस भू-तल पर बने रह कर अपने अलग अस्तित्व की रक्षा की उत्कंठा है।
फलतः, महादेवी की कविता में नारी हृदय की वेदना-विकलता तो है, पर मीरा जैसा उद्दाम प्रेम प्रवाह नहीं है।
सारांश यह है, कि मीरा का काव्य यदि आँसुओं भरे कंठ से निकली भर्राई हुई आवाज है, जो सहृदय मात्र को रसविभोर कर देती है तो महादेवी का काव्य मँजे गले की शास्त्रशुद्ध तान अलाप से युक्त है, जो कला मर्मज्ञों को ही चमत्कृत करती है।
साहित्यिक बारीकियों से दूर होते हुए भी मीरा के काव्य में छटपटाहट है, जो टीस और वेदना है वह महादेवी में नहीं है।