ममता सिंह ‘विशिष्ट’
धनबाद (झारखंड)
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ये हमारा है आर्यावर्त,
दूसरा नाम है भारतवर्ष।
विभिन्न वेशभूषा और व्रत,
भिन्न भाषा जानता जगत।
मेरा तो संबंध है यू.पी. से,
यहाँ पर मेरा जन्म हुआ।
बिहार में मैं पली-बढ़ी,
शिक्षा बिहार में पूर्ण हुई।
प्रशिक्षण और उच्च शिक्षा,
अब तो झारखंड में पूर्ण हुई।
बिहार-झारखंड पालनकर्ता,
यू.पी. तो है मेरा उदगमकर्ता।
तीनों के संस्कार है मुझमें,
तीनों का व्यवहार है मुझमें।
यू.पी. में हैं खिचड़ी पर्व विशेष,
दिन दही, चूड़ा शाम खिचड़ी शेष।
समूह बना मिलकर खेत जाते,
नमक, मिर्च और कच्चा साग खाते।
बादाम, चिक्की, घी का घेवर-लड्डू,
तिलवा-तिलकुट तिल का लड्डू।
काशी, बनारस, अयोध्या, वृंदावन,
तीर्थों की पावन नगरी कहलाए।
काशी में मोक्ष मिलता है तो,
राम नगरी अयोध्या कहलाए।
बिहार में छठ पूजा, तीन दिन व्रत,
सूर्योदय-सूर्यास्त को देते सब अर्घ्य।
स्वच्छता की प्रतीक है छ्ठ पूजा,
ऊँच-नीच का भेद-भाव नहीं दूजा।
पहला दिन शुरू होता कद्दू-भात से,
छठ पूजा में इस दिन संकल्प उठाते
शाम को दूसरे दिनभर उपवास करते,
दोस्ती पूरी और रसिया का भोग लगाते।
तीसरे दिन उपवास में ही ‘ठेकुआ’ बनाते,
सूर्यास्त को घाट पर जाकर सभी अर्घ्य देते।
ठेकुआ, चावल, लड्डू, नारंगी, पानीफल,
गन्ना, अनानास, डाव, सूप, दौरा, नारियल।
गाजर, मूली, कच्ची हल्दी का प्रसाद चढ़ाते,
सभी व्रत पूर्ण करने में सबका हाथ बढ़ाते।
कर्मा पूजा होती है झारखंड में धूमधाम से,
भाई की पूजा करती है बहन धूमधाम से।
पारम्परिक पकवान और होता सामूहिक नृत्य,
कर्म वृक्ष की पूजा रातभर, मादल थाप पर नृत्य।
नागों की हिन्दू देवी मंशा देवी का त्योहार,
गुड़-मखाने का प्रसाद चढ़ा होती खुशी अपार॥