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शिवोहम

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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जब ज्योति प्रेम की जलती है,
मन में उजियाला करती है
कहीं भक्ति भावना जाग उठे,
मन आप शिवाला करती है।

मन आप शिवाला करती है,
शिव धुन में ही रहती है
मिल जाए कोई शिव जैसा,
शक्ति का रूप धर लेती है

औघड़ दानी वरदान सहज,
हर कंटक माला करती है
हर-हर बम-बम की धूम मची,
कष्टों का निवाला करती है।

पूजन भक्तों का आभूषण,
बस दीन दयाला करती है
ज्योतिर्लिंग बारह धरती पर,
हर दिल गौशाला करती है।

शिव रूप जटाधारी महान,
कंठों में हाला करती है
नंदी, डमरू, त्रिशूल, सर्प,
गंगा में ढाला करती है।

ज्ञानदान, वरदान, मिले, तब
लुप्त वो छाला करती है
तप, दर्शन, आयुध, नृत्य, गीत,
की शिवमय शाला करती है।

संहार दुष्ट का, हो समूल,
त्रिनेत्र जो ज्वाला करती है
शेखर शिव की शरण चला,
जो शांत कराला करती है।

खुलता है अंतस का त्रिनेत्र,
तामसी, सात्विक बनती है
छू जाती सिर पर गंग-धार
चिर शांति पुनीता बहती है।

कैलाश की ध्वनि डमरू मृदंग,
काशी में सुनाई पड़ती है
यह ताप, प्रताप महाकर्णिका,
जीवन की ज्वाला हरती है।

चहुंओर शिवम शिव ब्रह्मनाद,
कण कण में सुनाई पड़ती है
हाँ, शिवोहम, हाँ, शिवोहम,
उन्चास पवन ध्वनि बहती है।

यह नाद शिवोहम मन में बसा,
जो आगे बढ़ता जाता है
मैं कौन ? कहाँ से आया हूँ,
वह स्वतःसमझता जाता है।

यदि ज्ञान हो गया इसका तो,
जीवन सार्थक हो जाता है।
मन में पा कर आनन्द परम,
वह जीवन का मूल्य समझता है॥