काव्यांजलि…
पटना (बिहार)।
अपने समय के जीवित शब्द-कोश थे आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव। संस्कृत सहित अनेक भारतीय भाषाओं के वे महापण्डित और ‘प्राकृत’ तथा ‘अपभ्रंश’ के अंतिम अधिकारी विद्वान थे। उन्होंने संत की भाँति साहित्य की साधना की। प्रणम्य साहित्यकार बाबू रघुवीर नारायण एक ऐसे कवि थे, जिनकी एक गीति-रचना ‘बटोहिया’ ने उन्हें साहित्य-संसार में सदा के लिए अमर कर दिया।
यह बात बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित जयंती समारोह एवं कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. अनिल सुलभ ने कही। डॉ. सुलभ ने बताया कि सम्मेलन का अगला अधिवेशन उनकी स्मृति को समर्पित रहेगा।
वरिष्ठ साहित्यकार जियालाल आर्य ने कहा कि बाबू रघुवीर नारायण की ही प्रेरणा से बनैली के राजा कीर्त्यानंद सिंह ने सम्मेलन के भवन निर्माण हेतु एकमुश्त दस हजार रूपए की सहायता दी थी।
विद्वान साहित्यकार मार्कण्डेय शारदेय ने कहा कि सूरिदेव जी एक बड़े साहित्यकार ही नहीं, साहित्यकारों के बड़े परिष्कारक थे। उन्होंने बहुत कुछ लिखा, किन्तु उससे भी अधिक अन्य साहित्यकारों का परिष्कार किया, प्रोत्साहन दिया।
वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानवर्धन मिश्र ने कहा कि बिहार सरकार को आचार्य श्रीरंजन सूरिदेव के नाम से राजभाषा पुरस्कार आरम्भ करना चाहिए। साहित्यकार डॉ. रत्नेश्वर सिंह, डॉ. सुमेधा पाठक, डॉ. समरेंद्र नारायण आर्य व डॉ. मेहता नगेंद्र सिंह आदि ने भी उद्गार व्यक्त किए।
इस अवसर पर कवि सम्मेलन का आरंभ चंदा मिश्र ने वाणी-वंदना से किया। वरिष्ठ कवि प्रो. सुनील कुमार उपाध्याय, सिद्धेश्वर, विद्या चौधरी, तनुजा सिन्हा एवं जय प्रकाश पुजारी आदि ने अपनी रचनाओं से काव्यांजलि दी। अतिथियों का स्वागत सम्मेलन के संगठन मंत्री अशोक कुमार ने किया।
मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने किया। धन्यवाद ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।