डॉ.विद्यासागर कापड़ी ‘सागर’
पिथौरागढ़(उत्तराखण्ड)
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विधु अहिवातिन बाट जोहती,
क्यूँ तरसाता है।
सता रहा क्यूँ पतिवंती को,
क्यूँ छुप जाता है॥
कभी ओढ़ लेता अंबुद को,
कैसे दिख पाये।
आ जा रूप सलोना लेकर,
सधवा हरषाये॥
बोल अबेर से आने पर क्या,
तू कुछ पाता है।
विधु अहिवातिन बाट जोहती,
क्यूँ तरसाता है…॥
निर्जल रहकर अरे तपी है,
तप कितना भारी।
तू विलंब क्यूँ करता है रे,
क्या है लाचारी॥
दिखता है तू शांत तुझे ये,
कहाँ सुहाता है।
विधु अहिवातिन बाट जोहती,
क्यूँ तरसाता है…॥
माना उसके प्राणेश्वर को,
अभय दान दे तू।
माथे की उस विंदी को भी,
गहन मान दे तू॥
फिर क्या अपनी सुंदरता का,
दंभ दिखाता है।
विधु अहिवातिन बाट जोहती,
क्यूँ तरसाता है…॥