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अपना धर्म निभाते हैं…

ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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मौन संघर्ष, हाथों में छाले, सम्मान कब ? (मजदूर दिवस विशेष)….

मेहनत की रोटी खाते हैं,
हम पसीना खूब बहाते हैं
सबका साथ निभाते हैं,
हम गीत खुशी के गाते हैं
‘मजदूर दिवस’ हम मनाते हैं…।

मकानों की नींव हमसे है,
बालू-सीमेंट के गारे हमसे है
हम ही तो ताजमहल बनाते हैं,
हाथों में छाले पड़ जाते हैं
‘मजदूर दिवस’ हम मनाते हैं…।

सम्मान के अधिकारी हम भी हैं,
बाल बच्चे परिवार हमारे भी है
मन हमारा भी तो सच्चा है,
अपमान भी हम सह जाते हैं
‘मजदूर दिवस’ हम मनाते हैं…।

कब तक श्रमिक रहेगा गौण,
अब यह सवाल करता है कौन
संघर्ष भी जब रहता है मौन,
श्रमिक हम सब कहलाते है
‘मजदूर दिवस’ हम मनाते हैं…।

हमसे ही तो अन्न के दाने हैं,
सब काम करवाने के बहाने हैं
हम ही खेतों में अन्न उगाते हैं,
बदले में थोड़ा अनाज पाते हैं
‘मजदूर दिवस” हम मनाते हैं…।

बड़े-बड़े मकान हमसे हैं,
खेत-खलिहान भी हमसे है
अस्पताल-विद्यालय हमसे हैं,
पुल और सड़क भी हमसे हैं।
हम अपना धर्म निभाते हैं,
‘मजदूर दिवस’ हम मनाते हैं…॥