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मजदूर नहीं, धरती की शान

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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मौन संघर्ष, हाथों में छाले, सम्मान कब ? (मजदूर दिवस विशेष)…

मजदूर नहीं, धरती की शान हैं,
मजदूर नहीं, हम भी धरती के इंसान हैं।

माना अपनी ज़िंदगी के कहाँ मालिक हम हैं,
खुश हो जाते कम में भी, पर बहुत गम हैं।

माथे पर पसीना आँखों में सपने हजार हैं,
मिट्टी लगी है मुठ्ठी में, रेखाओं में भाग्य हैं।

मंदिर, मस्जिद या हो ऊँची बिल्डिंगें,
खेतों के अनाज के ढेर पर कहाँ हमने अधिकार किया।

अपनी मजदूरियों से ही अपना गुजारा है,
सपने हजारों के बीच, बच्चों को पढ़ाना है।

अपनी सोई विभूतियों का, मजदूर भी ज्ञान जगाएंगे,
सुख का सूरज होगा, मजदूरी करके ही धरती को स्वर्ग बनाएंगे।

देवता भी धरती पर, देखने आते हैं,
हम तो धरती में अपना पसीना बहाते हैं।

करना सदा सम्मान हमारा, हम बे-हाल हैं,
हम मजदूरों से ही सबके घर-आँगन खुशहाल हैं॥