ममता साहू
कांकेर (छत्तीसगढ़)
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मानव के व्यवहार से,
प्रकृति है बड़ी नाराज
गर्मी के प्रकोप से,
तप रही है दुनिया आज।
मौसम ढा रहा सितम,
बढ़ गया लोगों का गम
बूँद-बूँद पानी को तरसे,
छाया है कैसा यह तम…?
पारा बढ़ रहा हर साल,
जीव-जंतु है सब बेहाल
प्रदूषण का रूप हुआ विकराल,
आखिर यह है किसकी चाल…?
अतिवृष्टि और ठंड की मार,
आग के गोले की बौछार
सहते हैं हम हर बार,
फिर भी क्यों करते हद पार…?
प्रकृति जब जिद पर आएगी,
ऐसा नाच नचाएगी।
कुछ नहीं आएगा काम,
हो जाएगा काम तमाम।
इसीलिए हे मानव बदलो अपना व्यवहार,
पर्यावरण संरक्षण की बातें न हो बेकार।
जीत मिले या मिले हार,
प्रकृति सजाने को हो जा तैयार॥