अब जरूरत तो मीडिया को आत्मावलोकन की…!

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अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

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अमूमन न्यायालय और खासकर उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देने और उनकी मीमांसा करने वाले मीडिया ने हाल में देश के प्रधान न्यायाधीश एन.वी.रमणा द्वारा मीडिया और विशेष रूप से इलेक्ट्राॅनिक मीडिया पर की गई तल्ख टिप्पणी पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं आई। ऐसा क्यों ? क्या इसलिए कि सीजेआई ने जो कहा, वो हकीकत है या फिर मीडिया इस टिप्पणी पर आत्म चिंतन करने की बजाए कार्यक्रम (एजेंडा) चलाने में ही अपना बहुआयामी हित देख रहा है ? अथवा मीडिया जगत में हालात अब उस मुकाम तक पहुंच चुके हैं, जहां से विश्वसनीयता के उस बिंदु तक पहुंचने की कोशिश बेमानी है, जो कभी पत्रकारिता की साख का आधार होती थी!
न्यायाधीश श्री रमणा ने हाल में कहा कि आज देश में कई मीडिया संगठन ‘कंगारू कोर्ट’ चला रहे हैं… वो भी ऐसे मुद्दों पर, जिन पर फैसला करने में अनुभवी न्यायाधीशों को भी कठिनाई होती है। न्याय देने से जुड़े मुद्दों पर गलत जानकारी और एजेंडा-संचालित बहसें लोकतंत्र के लिए हानिकारक साबित हो रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रिंट मीडिया तो अब भी कुछ हद तक जवाबदेह है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कोई जवाबदेही नहीं है, वह जो दिखाता है वो हवा-हवाई है। अगर इस वक्तव्य को थोड़ा और विस्तारित करें तो मामला उस संचार माध्यम तक भी पहुंचता है, जिसका भगवान ही मालिक है और जो समाज में भ्रम फैलाने में आज निर्णायक भूमिका है। अफसोस की बात यह है कि कोई भी इसे प्रभावी ढंग से नियमित करने की बात नहीं करता।
न्यायाधीश ने जो कहा उसका आशय है कि आज न्याय देने वाली संस्था के समक्ष यह सबसे बड़ी चुनौती है कि बिना पुख्ता सबूतों और न्याय प्रक्रिया का पालन किए बगैर मनमाने ढंग से इलेक्ट्राॅनिक मीडिया किसी को भी आरोपी के कटघरे में खड़ा कर देता है और एक खास राय या उद्देश्य बनाते हुए उसे दोषी भी सिद्ध कर देता है। इस कथित ‘दोषसिद्धि’ में भले ही कोई शारीरिक दंड न दिया जाता हो, लेकिन मानसिक प्रताड़ना इसकी तुलना में कई गुना ज्यादा घातक होती है। कई बार तो मीडिया आरोपित की स्थिति ऐसी कर देता है कि वो कहीं का नहीं रहता। अलबत्ता इस ‘कंगारू कोर्ट’ के तथाकथित फैसलों से उन तत्वों के हित जरूर सधते हैं, जो समाज को शांति और सुकून से नहीं रहने देना चाहते।
यहां सवाल यह है ऐसी ‘स्वघोषित’ अदालतों का विचार आया कहां से ? और ऐसी नकली अदालतों को ‘कंगारू कोर्ट’ ही क्यों कहा गया ?
कंगारू नामक स्तनधारी प्राणी ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है और उछल-उछल कर चलता है। यूँ दुनिया में राजा तानाशाह बन जाए तो उसके द्वारा किए फैसलों पर कोई सवाल नहीं उठा सकता। ऑक्सफोर्ड इंग्लिश शब्दकोश- के अनुसार ‘कंगारू कोर्ट’ (
कंगारू अदालतें) शब्द संभवत: १८ वीं सदी में ऑस्ट्रेलिया में बसाई गई पीनल काॅलोनीज (दांडिक बसाहटें) से निकला है। इन काॅलोनियों में इग्लैंड के सजायाफ्ता खूंखार अपराधी जहाजों में भरकर ऑस्ट्रेलिया निर्वासित कर दिए जाते थे। रास्ते में भी इनके साथ जानवरों जैसा ही सलूक होता था। इनमें कई ऐसे भी होते थे, जिन्हें मृत्युदंड देने की जगह सुदूर ऑस्ट्रेलिया भेज दिया जाता था, जहां से लौटना उनके लिए लगभग असंभव था।
अमेरिकी स्रोतों के अनुसार ‘कंगारू कोर्ट’ शब्द का पहली दफा इस्तेमाल १८४१ में अमेरिका से प्रकाशित अखबार ‘द डेली पिकायुन’ में छपे एक लेख से हुआ। इस लेख में कहा गया था कि ‘कंगारू कोर्ट’ द्वारा लगाए गए आरोपों के आधार पर कुछ लोगों की ‘हत्याएं’ कर दी गईं। यह एक तरह से एक से दूसरी खदान पर छलांग लगाना था, जो कंगारू की उछाल की तरह था। इसमें कोई नियम-कायदा नहीं था। बेसबाल के खेल में तो अभी भी किसी खिलाड़ी को गलती करने पर सजा देने को ‘कंगारू कोर्ट’ का फैसला ही कहा जाता है। नाजी जर्मनो की जन अदालत इसी का परिणाम थी तो नक्सली और तालिबानी अदालतें भी इसी प्रकार की हैं। इनमें एकतरफा आरोप लगाकर व्यक्ति को मनमाना दंड दे दिया जाता है। कंगारू कोर्ट में कोई वकील, दलील या अपील नहीं होती। अगर किसी को दोषी मान लिया गया है तो वह दोषी है। न्याय प्रणाली से इतर हत्याएं, न्यायिक कदाचार, लिंचिंग, फर्जी मुकदमे, नकली अदालतें ‍आदि कंगारू कोर्ट ही कहलाते हैं। इसमें किसी का कोई संवैधानिक दायित्व नहीं होता।
हमारे देश में मानो मीडिया ने कंगारू कोर्ट का काम संभाल लिया है। किसी भी व्यक्ति खासकर हस्ती को लेकर पूरे मामले का प्रस्तुतिकरण इस अंदाज में किया जाता है कि मानो लक्षित व्यक्ति पहले ही दोषी है। ऐसा करने का किसी को मलाल भी नहीं होता। उल्टे इनसे कुछ लोगों के राजनीतिक हित जरूर सधते हैं। ऐसे कई संवदेनशील मामलो में ‘कंगारू कोर्ट’ की तरह मीडिया का व्यवहार देश और समाज के लिए विभाजक सिद्ध हो रहा है। टीवी पर ऐसी बहसें चलाई जा रही हैं, जिससे लोगों की भावनाएं भड़कें। सीधा समीकरण है कि जो ‍चैनल जितनी गाली-गलौज करेगा, जो जितना ज्यादा बवाल खड़ा करने की कोशिश करेगा, उसकी टीआरपी सबसे ज्यादा। और टीआरपी ज्यादा का मतलब ज्यादा विज्ञापन। इस विज्ञापनों के लिए भी पैसा भी परोक्ष रूप से हम ही देते हैं, विज्ञापित वस्तुओं को खरीदकर। यानी ऐसे कंगारू कोर्ट के दर्शक बनकर भी हम इस ‘पाप’ में अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार बनते हैं।
इससे संवैधानिक न्याय प्रणाली के तहत वैधानिक फैसले देने वाले न्यायाधीशों के सामने मुसीबत होती है, जबकि न्यायिक फैसले राय पर नहीं, तथ्यों, तकों और सबूतों के आधार पर होते हैं। महज जज्बात के आधार पर अदालत के फैसले नहीं होते। कंगारू कोर्ट में इन सबकी आवश्यकता नहीं होती। वहां हमने ‘कह दिया सो कह दिया’ वाला सामंती भाव होता है, जो नैसर्गिक न्याय ‍के सिद्धांत के भी खिलाफ है।
इस पूरे मामले में न्यायपालिका की भूमिका और कार्य-शैली भी सवालो से परे है, ऐसा नहीं है, लेकिन मीडिया को यह अधिकार किसने दिया कि वह खुद ही घटना की प्रस्तुति के साथ न्याय दंड भी अपने हाथ में ले ले। मीडिया का काम केवल तथ्य पेश करना है, वो तथ्य जो शायद अदालत के संज्ञान में नहीं लाए गए या अनदेखे रहे। वह जनमत को भी दिखा सकता है। इस मामले में इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की फिर भी अपनी सीमा है, लेकिन सामाजिक माध्यम तो पूरी तरह बेलगाम है। इसमें भाव यह कि अगर हमारी मर्जी के मुताबिक फैसला न दिया तो ऐसी न्याय व्यवस्था किस काम की। यह बहुत गलत सोच है और लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। माॅब लिंचिंग या किसी सामाजिक माध्यम में पोस्ट के आधार पर किसी की सरेआम हत्या इसी मानसिकता के निकृष्ट और बेहद चिंताजनक उदाहरण हैं।तात्पर्य यही है कि न्याय प्रक्रिया पूरी किए बगैर कोई भी धारणा बना लेना या बनाने में अहम भूमिका निभाने की इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए घातक है। पक्षपात पूर्ण विचार का प्रसार हमेशा हानिकारक ही होता है। इससे न्यायदान की प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है। अदालतें कानून से बंधी होती हैं। उन्हें अपने फैसलों का तार्किक आधार भी देना होता है, और मीडिया इसी आधार को पलीता लगाने पर तुला है। मीडिया का काम लोगों को सही और वास्तविक स्थिति से अवगत कराना है, न कि किसी रेवड़ को हांकने में मदद करना। इसका अर्थ यह नहीं कि मीडिया आँख मूंद कर काम करे, लेकिन ये जिम्मेदारी का अंजन डालकर खुली रहनी चाहिए। इस पर सोचना तो खुद मीडिया को है।

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