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अब राखी में भाई-बहन के प्यार का वह ज्वार नहीं

ललित गर्ग
दिल्ली
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स्नेह के धागे…

भारत धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं और त्योहारों का देश है, यहाँ के हर त्योहार का अपना एक मकसद और रंग होता है, जो विभिन्न धर्मों, समाजों एवं लोगों को करीब ले आता है। रक्षा-बंधन भी ऐसा ही अनूठा सांस्कृतिक पर्व है। राखी के धागे बहन के पवित्र प्रेम और रक्षा की डोरी भर नहीं है, बल्कि यह धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक एकबद्धता एवं एकसूत्रता का अमोघ साधन है। राखी का त्योहार महिलाओं को समानता एवं सुरक्षा प्रदान करने के लिए संकल्पित होने का अवसर प्रदान करता है, क्योंकि अगर नजर उठाकर देखें, तो कठिनाइयों और चुनौतियों से भरे क्षेत्रों में महिलाएं अब अपनी अद्भुत कार्यशैली से चमत्कृत बुलंदियाँ छू रही हैं। चाहे सेना हो या पहलवानी के अखाड़े, हर जगह समूची दुनिया उनका तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत करती है। बंधनों, उत्पीड़न एवं उपेक्षा से नारी को मुक्ति दिलाने की प्रेरणा राखी के धागों में गूंथी हुई है। रक्षाबंधन स्नेह का वह अमूल्य बंधन है, जिसका बदला धन तो क्या सर्वस्व देकर भी नहीं चुकाया जा सकता। यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है, वही लगातार असुरक्षा एवं अस्मिता के लिए जूझती नारी को एक आश्वासन है उसकी रक्षा का। राखी के जरिए बहनें भाई की सलामती की दुआ मांगती हैं, तो भाई ता-उम्र बहन की हिफाजत का बीड़ा उठाते हैं, फिर चाहे रिश्ता खून का हो या सिर्फ कच्चे धागे का या फिर मानवीय संबंधों का। निश्चित ही नारी अस्मिता एवं अस्तित्व से जुड़ा राखी का त्योहार आदर्शों का हिमालय और संकल्पों का सोपान है।
रक्षाबंधन प्यार के धागों का एक ऐसा पर्व है, जो घर-घर ही नहीं, समाज एवं राष्ट्र में मानवीय रिश्तों में नवीन ऊर्जा का संचार करता है। बहनों में उमंग और उत्साह को संचरित करता है, वे अपने प्यारे भाइयों के हाथ में राखी बांधने को आतुर होती हैं। बेहद शालीन और सात्विक यह पर्व सदियों पुराना है-तब से अब तक नारी सम्मान एवं सुरक्षा पर केन्द्रित यह विलक्षण पर्व है। सगे भाई-बहन के अतिरिक्त अनेक भावनात्मक रिश्ते भी इस पर्व से बँधे होते हैं जो धर्म, जाति और देश की सीमाओं से परे हैं। यह पर्व आत्मीयता और स्नेह के बन्धन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का पर्व है। रक्षा-बंधन मानवीय भावों का बंधन है। यह प्रेम, त्याग और कर्तव्य का बन्धन है। इस बंधन में एक बार भी बंध जाने पर इसे तोड़ना बड़ा कठिन है। इन धागों में इतनी शक्ति है, जितनी लोहे की जंजीर में भी नहीं ।
राखी के इस अभूतपूर्व पर्व को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक प्रसंगों को समझना बेहद जरूरी है, वरना इस पर्व की रंगत अधूरी रह जाएगी। भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि, देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नजर आने लगे। भगवान इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गए। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया, जिसके बाद इंद्र विजयी हुए। इस पर्व के अनेक ऐतिहासिक प्रसंग भी हैं। राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे, तब महिलाएँ उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ-साथ हाथ में राखी भी बाँधती थी।
राखी एक धागा प्रेम का है, जो इस पर्व को एक लौकिक महत्व प्रदान करता है, यह धागा भाई-बहन के रिश्तों को और मजबूत करता है। जो सिर्फ प्यार और अपनेपन का संदेश ही नहीं देता, बल्कि कर्तव्यों का भी बोध कराता है। राखी के धागे को देखकर हर भाई को अपनी बहन के प्रति कर्तव्यों का आभास होता है। महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि, जब ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूँ ? तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि राखी के इस रेशमी धागे में वह शक्ति है, जिससे आप हर आपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। जब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया, तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उँगली पर पट्टी बाँध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। श्रीकृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। इस तरह राखी के २ धागों से भाई-बहन का ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवीय संवेदनाओं का गहरा नाता रहा है।
राखी के त्योहार का ज्यादा महत्व पहले उत्तर भारत में था। आज यह पूरे भारत में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इसे ‘नारली पूर्णिमा’ के नाम से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में इसे ‘अवनी अविट्टम’ के नाम से जाना जाता है। स्कन्ध पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत में वामनावतार नामक कथा में भी रक्षा-
बन्धन का प्रसंग मिलता है।
राखी के बारे में प्रचलित ये कथाएं सोचने पर विवश कर देती हैं कि, कितने महान उसूलों और मानवीय संवेदनाओं वाले थे वे लोग, जिनकी देखा-देखी एक संपूर्ण परंपरा ने जन्म ले लिया और आज तक बदस्तूर जारी है। आज परंपरा भले ही चली आ रही है, लेकिन उसमें भावना और प्यार की वह गहराई नहीं दिखाई देती। अब उसमें प्रदर्शन का घुन लग गया है। पर्व को सादगी से मनाने की बजाय बहनें अपनी सज-धज की चिंता और भाई से राखी के बहाने कुछ मिलने के लालच में ज्यादा लगी रहती हैं। भाई भी उसकी रक्षा और संकट हरने की प्रतिज्ञा लेने की बजाय जेब हल्की कर इतिश्री समझ लेता है। अब राखी में भाई-बहन के प्यार का वह ज्वार नहीं दिखाई देता, जो शायद कभी रहा होगा। इसलिए राखी के इस परम पावन पर्व पर भाइयों को ईमानदारी से पुनः अपनी बहन ही नहीं, बल्कि संपूर्ण नारी जगत की सुरक्षा और सम्मान करने की कसम लेने की अपेक्षा है। तभी यह पर्व सार्थक बन पड़ेगा और भाई-बहन का प्यार शाश्वत रह पाएगा।