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आँचल में दूध, आँख में पानी

डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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नारी :मर्यादा, बलिदान और हौसले की मूरत…

औरत की कहानी सुन,
औरत की जुबानी
दिल थाम के रखना,
आँख में आए ना पानी
लिए फिरती है आँचल में,
दूध और आँख में पानी
करूणा की वो मूर्ति है,
कदर किसी ने ना जानी।

मार लेती है अपने मन को,
अगर कुछ करने को ठानी
परिवार की खातिर खुद,
जी ना पाती मन-मानी
जज्बात छुपाए लबों पर,
मुख पर जख्मों की कहानी
चुपचाप गुजारे जाती है,
वह अपनी जिन्दगानी।

फिसल जाए वक्त हाथों से,
तो याद आए बीती जवानी
कैसे गुजारा था अपना वक्त,
कैसी रही अपनी जिन्दगानी
ममता की मूरत थी कभी,
अब हैं कमर इसके कमानी
कदम सम्भाले न संभलते,
अब हो गयी तोतली वाणी।

सबके स्वार्थ तो हुए पूरे,
उसके ख्वाब रहे अधूरे
लगा खुद को टटोलूं, कुछ,
पल अपने लिए भी जी लूँ
अकेलेपन से इस अबला,
का जब जी भर आया।
सोंचने लगी पलभर को,
हमने क्या खोया, क्या पाया ?

ढल चुकी उमर अब आई
शाम की बेला सुहानी
ले ले सबक इससे फिर,
दोहराई जाए ना कहानी।
आ जाएगी किसी दिन मौत,
कर जाएगी मेहरबानी।
दफन हो जाएगी कफन में,
ना जाने ऐसी कितनी कहानी॥

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