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आओ दीप जलाएँ

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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तम की काली रात हटाने उजियारा फैलायें।
अँधियारा ना रहे कहीं भी, आओ दीप जलायें॥

सूरज उगा नहीं सकते जुगनू तो बन सकते हैं,
जग में फैले अंधकार को कुछ तो हर सकते हैं।
रोशन करने राह सभी की हम शम्माँ बन जायें,
अँधियारा ना रहे कहीं भी, आओ दीप जलायें…॥

हो भाईचारा सबमें अलगाव न आने पाए,
कोई अपना दूर नहीं अपनों से होने पाए।
नेह प्रेम की धारा हर इक दिल में चलो बहायें,
अंधियारा ना रहे कहीं भी, आओ दीप जलायें…॥

बना रहे सद्भाव दिलों में नफ़रत कभी न आए,
ऊँच-नीच सब भूल सभी को अपने गले लगाएं।
इक-दूजे का दर्द बाँटने आगे हाथ बढ़ायें,
अंधियारा ना रहे कहीं भी, आओ दीप जलायें…॥

हर घर हर दरवाजे पर अब बंदनवार लगेगी,
छत-चौबारे जगमग-जगमग अवलि दीप सजेगी।
पूजन कर गणपति गणनायक दीपावली मनायें,
अंधियारा ना रहे कहीं भी, आओ दीप जलायें…॥

धरती से आकाश तलक सारे रोशन हो जाए,
इतने दिए जला दो के अंधियार नज़र ना आये।
चला प्यार की फुलझड़ियाँ सब खुशियांँ खूब मनायें,
अंधियारा ना रहे कहीं भी, आओ दीप जलायें…॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है

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