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आखिर देखता कौन है ?

बोधन राम निषाद ‘राज’ 
कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
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जिंदगी की खातिर (मजदूर दिवस विशेष)…..

मज़दूर जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिलती,
तन लपेटने को,जिन्हें लंगोटी नहीं मिलती
क्या सर्दी,क्या गर्मी,क्या बरसात ?
ये विवश है,छोटे से पेट के लिए
आखिर देखता कौन है…?

खाई को पाटता,पर्वतों को काटता,
कंटक उखाड़ फेंक,रास्ता बनाता
नंगे पैर जिनके छाले पड़ गए,
लोग चलते-फिरते पहनते हैं चप्पल
आखिर देखता कौन है…?

बचपन से लेकर जवानी तक,
नहर,बाँध से लेकर किसानी तक
रात-दिन बस काम ही काम,
जरा सोचों,उन्हें मिलता है आराम ?
आखिर देखता कौन है…?

अजीब है दुनिया,कागजों के पुल पर चलती है,
हम मजदूरों की जिंदगी तो आश्वासन पर पलती है।
जिंदगी का ज़हर तो यूँ ही पी रहे हैं,
दुनिया की निगाहों में हम शान से जी रहे हैं॥
आखिर देखता कौन है…?

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