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आजादी का नायक

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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‘नेताजी’ अवतरण दिवस विशेष…..


सन् अट्ठारह सौ सतानवें कटक शहर में जन्म लिया,
तेईस जनवरी को ईश्वर ने धरती पर था भेज दिया।

पिता जानकी दास बोस माँ प्रभावती थी कल्याणी,
नाम सुभाष बोस जिह्वा पर मुखरित हुई मातु वाणी।

मेधावी बालक सुभाष आजादी का दीवाना था,
भारत को आजाद कराऊँ ऐसा मन में ठाना था।

था सुभाष इक आग धरा पर ये उसकी ही गाथा है,
उसकी पावन यादों में झुक जाता अपना माथा है।

ऐसी आग भरी थी उसने नवयुवकों के सीने में,
जियो देश की खातिर वर्ना क्या रक्खा है जीने में।

अंग्रेजों के लिए हृदय में उसके आग सुलगती थी,
भारत की आज़ादी की दिल में मशाल-सी जलती थी।

जर्मन और जापान साथ ले ऐसा बिगुल बजाया था,
दिल्ली चलो,जय हिन्द का नारा नभ में तब गुँजाया था।

विश्व युद्ध जब हुआ दूसरा कूद पड़ा था वो रण में,
अंग्रेजों को धूल चटाई गूँज वीर की कण-कण में।

अंग्रेजों ने सुभाष की हत्या का प्लान बनाया था,
बहुत देश संगी सुभाष के तभी मार नहीं पाया था।

जा विदेश में सुभाष ने आजाद फौज निर्माण किया,
हुंकार भरी थी जोशीली जय हिन्द घोष का नाद किया।

मुझको दो तुम खून सभी आजादी तुमको मैं दूँगा,
ब्रिटिश राज्य को भारत से बाहर निकाल के दम लूँगा।

भारत के सभी जवानों में इक क्रांति आग सुलगाई थी,
भारत से अंग्रेज भगाओ सबको कसम दिलाई थी।

भारत तो आजाद हुआ पर देख सुभाष नहीं पाता,
बही खून की जो नदियाँ वो देख देख कर मर जाता।
सन् उन्नीस सौ पैंतालिस में प्लेन क्रेश में अंत हुआ।
अब तक भारत में ऐसा नहीं कोई वीर अरु कंत हुआ।

आज देश अपना देखो विघटन कगार पर खड़ा हुआ,
अलगाववाद का दैत्य तोड़ने भारत को है खड़ा हुआ।

अपने हाथों जन्मभूमि को लज्जित ये करवाते हैं,
जिस थाली में खाया है उसमें ही छेद बनाते हैं।

आज जरूरत है सुभाष जैसा ही कोई आ जाए,
जलती इस भारत भूमि को इन दैत्यों से बचा जाए।

याद करें गाथा सुभाष की नैन नीर से भर जाए,
ऐसे वीर जियाले की ही याद बहुत हमको आए।

जन्मदिवस पर आज उन्हें श्रद्धा के पुष्प चढ़ा दो,
इस वीरात्मा को याद करो और आँसू चार बहा दो॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है